पवनमुक्तासन के वातनिरोधक प्रकार में पाचन प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए आसन किये जाते हैं। कमजोर पाचन शक्ति और पाचन शक्ति से जुड़े रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह योगासन बेहद उपयोगी हैं। 

पवनमुक्तासन का नियमित अभ्यास करने से शरीर कठिन आसन करने में योग्य एवम सक्षम बनता है। इनका संबंध पाचन प्रणाली को सशक्त करने से है। इस आसन समूह का अभ्यास करने से कब्ज, अपचन, स्नायु एवं मांसपेशियों की गड़बड़ी शरीर में टूटन, दर्द, मधुमेह, पुरुष तथा स्रीयों की प्रजनन संस्था की अव्यवस्था, वेरिकोस वैन्स आदि से पीड़ित व्यक्ति को लाभ मिलता है। 

वात का निरोध और पाचन प्रणाली को सक्षम बनाने के लिए कौन से योग करने चाहिए और कैसे करने चाहिए इसकी जानकारी निचे दी गयी हैं :


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पाचन शक्ति को ठीक रखने के लिए कौन से योग करने चाहिए ? Yoga for digestion in Hindi

शरीर एवम् मन को शवासन में लेटा कर शांत एवम शिथिल करके अभ्यास प्रारंभ करें। साथ ही हर आसन के पश्चात आवश्यकतानुसार शवासन का अभ्यास करते रहे। पूर्ण अभ्यास के दौरान अति तनाव को दूर रखें। हलका तथा मधुर तनाव स्वाभाविक है।

सावधानियां 

जो व्यक्ति उच्च रक्तचाप, गंभीर हृदय विकार, पीठ का निचला दर्द जैसे साइटिका, स्लिप डिस्क आदि से पीड़ित हो उन्होंने इन आसनों को योग प्रशिक्षक के मार्गदर्शक में ही करना चाहिए।

प्रारंभिक स्तिथि 
  • पीठ के बल लेटे।
  • दोनों पैरों को आपस में मिला दे एवं सीधा रखें।
  • हाथों को कमर के बाजू शरीर से सटाकर रखें। हथेलियों का स्पर्श भूमि से हो। 
  • मेरूदंड ,गर्दन तथा सिर सीधे हो।

उत्तानपादासन ( पैर उठाना )

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उत्तान का अर्थ होता है उठाना तथा पाद का अर्थ होता है पाँव।  इस आसन का अर्थ है पांव को उठाना। 
  1. प्रारंभिक स्थिति में लेट जाएं। 
  2. पूरक करते हुए पैर को ऊपर उठाएं। 
  3. घुटने में पैरों को सीधा रखें। 
  4. भूमि से समकोन बनाकर पैर को ज्यादा से ज्यादा ताने।
  5. पैर को  5 सेकंड तक रोक कर नीचे लाएं तथा भूमि से 5 सेंटीमीटर पर स्थिर करें। भूमि से स्पर्श न कराये।
  6. फिर इस क्रिया को दोहराएं इस प्रकार पांच आवृतियां करें।
  7. पैरों को उठाते समय पूरक करें। नीचे लाते समय रेचक एवम स्थिर रखते हुए कुंभक करें। 
  8. विपरीत पैर से भी यही क्रिया करे। 

चक्रपादासन ( पैर घुमाना )

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मोटापा, नितंबों के जोड़ में कड़ापन, पीठ के स्नायु आदि की बीमारियां, अशक्तता आदि आज की जीवन पद्धति की देन है। कई ऐसी गतिविधियां है जिन्हें हमारा शरीर करने की क्षमता रखता है लेकिन आज के जीवन पद्धति में ऐसी गतिविधियों पर मर्यादा आ गई है। इसी वजह से इनका अभ्यास कर हम उस क्षमता को बनाए रख सकते हैं। 
  1. प्रारंभिक स्थिति में लेटे। श्वास तथा हृदय की गति सामान्य हो। 
  2. दाहिने पैर को भूमि से 5 सेंटीमीटर ऊपर उठाएं तथा घुटनों में सीधा रखकर दाहिनी दिशा में अर्थात शरीर के बाहर की ओर बड़े से बड़े वृत्त घुमाएं।
  3. पैरों को वृताकार घूमाते वक्त एड़ी भूमि से ऊपर उठी रहेगी। 
  4. यही क्रिया विपरीत दिशा में भी करे। 
  5. क्षमता अनुसार आवृत्तियां करने के बाद बाए पैर से भी यही कृति करना है किंतु बाए पैर को पहले बाई दिशा में अर्थात शरीर से बाहर की दिशा में घुमाइये। तत्पश्चात विपरीत दिशा में दोहराइए।
  6. पर्याप्त विश्राम के उपरांत संपूर्ण प्रक्रिया दोनों पैरों को मिलाकर करें। 
  7. इस क्रिया में प्रारंभ में पहले घड़ी के सुई की दिशा में पैरों को घुमाना है तथा बाद में विपरीत दिशा में घुमाना है।
  8. पूरक करते हुए पैरो को 5 सेंटीमीटर ऊपर उठाए तथा अंतः कुंभक के साथ घूमाइये। रेचक के साथ पैरों के नीचे लाएं। 

पादसंचालन ( साइकिल चलाना )

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  1. प्रारंभिक स्थिति में लेट जाएं। 
  2. सर्वप्रथम दाएं पैर को उठाएं और इस तरह घुमाइए जैसे आप साइकिल चला रहे हो, मात्र याद रखें पैर जब पेट की तरफ आता है तब जांघों का स्पर्श उदर से हो।
  3. मर्यादा अनुसार आवृत्तियां करें। तत्पश्चात विपरीत दिशा में भी करें।
  4. यही क्रिया बाएं पैर से भी करें।
  5. दोनों पैरों को के साथ पृथक-पृथक करने के पश्चात पैरों को मिलाकर यह कृति करना है।
  6. पैरों को उठाते समय पूरक करे। घुमाते समय अंतः कुंभक करें और पैरों को नीचे लाते हुए रेचक करें। 
  7. ध्यान रखे, इस क्रिया में सिर सहित शरीर को जमीन पर सपाट रखें अर्थात उठाना नहीं है। 
  8. प्रत्येक अभ्यास के बाद आवश्यकता के अनुसार कुछ क्षण शवासन में रहकर श्वास-प्रश्वास की गति को सामान्य होने दे। 

सुप्तपवन्मुक्तासन

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यह अभ्यास हमारे उदरस्थ अपान वायु को मुक्त कराता है,  साथ ही आमाशय संबंधी रोग व कब्ज दूर करके पाचन प्रणाली को तंदुरुस्त रखता है।
  1. प्रारंभिक स्थिति में लेट जाए। दाहिने पैर को घुटनों में वक्षस्थल पर ले आए। 
  2. घुटनों को छाती के साथ मिलाते समय दोनों हाथों से घुटनों को पकड़ ले।
  3. अब लेटकर पूरक कर लें तथा रेचक करते हुए सिर उठाए। नासिका का स्पर्श घुटनों से होने के पश्चात कुछ क्षणों तक बहिःकुम्भक की स्थिति में रहे।
  4. पुनः पूरक करते हुए याने श्वास लेते हुए धीरे-धीरे सिर को नीचे कीजिए और पैर को सीधा करते हुए शवासन में शरीर को ढीला छोड़िए।
  5. दुबारा यह क्रिया करिए। करीब 10 बार दोहराइए।
  6. बाए पैर से भी 10 बार यह क्रिया करें।
  7. फिर दोनों पैर एक साथ ऊपर उठाकर हाथों से  घुटनों को पूर्ण रुप से लपेट कर फिर से 10 बार कीजिए। 

लुढ़कना - झूलना आसन 

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  1. पीठ के बल लेटकर दोनों पैरों को छाती तक मोड़ लीजिए। 
  2. हाथों की अंगुलियों को परस्पर बांधकर सिर के पीछे रखें शेष हाथ के हिस्से को फैलाकर जमीन पर रखे।
  3. स्वाभाविक श्वास के साथ शरीर को दोनों तरफ बारी-बारी लुढक़ाइये। ध्यान रहे पैरों के पंजे जमीन को न छुए किंतु घुटनों से जमीन को स्पर्श करने की कोशिश करें। 
  4. यह क्रिया करीब 10 बार कीजिए।

प्रकारांतर 

  1. अपने पैरों पर उकडू बैठ जाएं। दोनों पैर सटा कर रखे और भुजा को घुटनों के चारों तरफ लपेटिये।
  2. पूरे शरीर को रीढ़ पर कस कर धीरे-धीरे लुढकिये। फिर उकड़ू स्तिथि में आइए।
  3. इस क्रिया को करीब 10 बार करें।
  4. इस आसन में विशेष ध्यान योग्य बात यह है कि यह आसन केवल जमीन पर अथवा पतले कंबल पर ना करें। लुढ़कते वक्त ध्यान रखें कि सर ज़मीन से ना टकराए। 
  5. मोटे कंबल का उपयोग करें इससे पीठ कमर और नितंबों की मालिश होती है। 
  6. ऑस्टियोपोरोसिस तथा मेरुदंड संबंधी शिकायत वाले इस क्रिया का अभ्यास ना करें। 

सुप्त उदराकर्षण आसन 

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इस आसन का अभ्यास तीन प्रकार से किया जाता है।

प्रथम अभ्यास 
  1. प्रारंभिक स्तिथि में लेट जाएं।
  2. दोनों पैरों को घुटनों में मोड़ कर खड़ा रखें।
  3. हाथों को एक दूसरे में पिरोकर गर्दन के नीचे रखें। कोहनियां भूमि से स्पर्श करे। भुजाएं कंधे की सीध में रखें। 
  4. दोनों पैरों में करीब डेढ़ फिट का अंतर रखें। 
  5. पूरक करते हुए घुटने दाहिनी और भूमि की तरफ ले जाए। दाहिने घुटने का स्पर्श भूमि से हो तथा बाए घुटने का स्पर्श दाहिने एड़ी से होगा।
  6. गर्दन को घुटनों की विपरीत दिशा में ले जाएं। 
  7. रेचक करते हुए पैरों को पूर्व स्थिति में खड़ा करें तथा पूरक करते हुए बाई तरफ यही कृति दोहराइये।  इस बार दाहिने घुटने का स्पर्श बायीं एड़ी से होगा।
  8. आवश्यकतानुसार आव्रुत्तियाँ करें। 

द्वितीय अभ्यास 

  1. प्रारंभिक स्थिति में लेट जाएं।
  2. दोनों पैरों को घुटनों में मोड़ कर खड़ा रखें, मात्र इस बार घुटने, एड़िया तथा पैरों के अंगूठे एक दूसरे से मिले हुए हो।
  3. हाथों को गर्दन के नीचे एक दूसरे में पिरोकर रखें।
  4. शेष वर्णन प्रथम अभ्यास की तरह है, मात्र घुटने एड़िया तथा अंगूठे को मिलाकर ही पूर्ण कृति करें। 
तृतीय अभ्यास 
  1. प्रथम दोनों अभ्यास की तरह ही सिद्धता करे तथा घुटनों को नाभि पर रखे। मात्र एड़िया उठी हुई और कूल्हों से लगी हुई हो।
  2. शेष गतिविधि द्वितीय अभयास की तरह ही करें। 

नौकासन 

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  1. शवासन में लेटिये किंतु हथेलियों को जमीन की ओर करें एवं पैरों को सटा कर रखें।
  2. पूरक अर्थात श्वास लेते हुए पैरो, भुजाओ, सीर एवं धड़ को जमीन से ऊपर उठाइए।
  3. सिर जमीन से 1 फुट से अधिक न उठाएं। भुजाएं एवं पैरों की अंगुलियों को एक सीध में रखें ताकि हाथ की अंगुलियों के ऊपर से पैर की अंगुलियों पर दृष्टि कर सकें। 
  4. आराम से जितनी देर संभव हो इतनी देर कुंभक करते हुए रुके इसके पश्चात रेचक अर्थात श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे जमीन पर वापस लौटिए। पूरे शरीर को ढीला छोड़िए।
  5. इस आसन को भी करीब 5 बार दोहराइए। 
  6. उठे हुई स्तिथि में शरीर को अधिक से अधिक उतने समय तक रखे जब तक आमाशय की मांसपेशियों में कंपन का अनुभव ना हो। 
  7. यह आसन स्नायु दुर्बलता एवं तनाव पीड़ित व्यक्तियों के लिए उपयोगी है।
इस तरह ऊपर दिए हुए सभी योग करने से वाट निरोध होता हैं, शारीरिक मजबूती प्राप्त होती है और आपकी पाचन शक्ति भी सक्षम रहती हैं।
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