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प्रेगनेंसी के पुरे 9 महीने इंतजार करने के बाद जब शिशु पहली बार इस दुनिया में आता है तो सभी को बेहद ख़ुशी होती हैं। इस ख़ुशी के साथ नयी माताओं को यह चिंता भी होती है की क्या वह अपने शिशु को ठीक से स्तनपान / Breast feeding करा पाएंगी।   


जन्म के बाद पहले 6 महीने तक शिशु का सारा पोषण माँ के दूध पर निर्भर करता है और ऐसे में जरुरी है की माँ को बच्चे को कैसे और कब स्तनपान कराना है इसकी सम्पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। स्तनपान कराते समय क्या सावधानी बरतनी चाहिए, ऊपर का दूध कब पिलाना चाहिए और स्तनपान के समय माँ और बच्चे को होनेवाली परेशानी से कैसा बचाना चाहिए इसकी भी जानकारी माता को होना बेहद जरुरी होता हैं। 

आज इस लेख में हम स्तनपान को लेकर यह सभी जानकारी देने जा रहे है :


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नयी माताओं के लिए स्तनपान से जुडी महत्वपूर्ण जानकारी How to breastfeed information in Hindi

स्तनपान कराना क्यों जरूरी है ? 

माँ का दूध शिशु के पलने-बढ़ने के लिये जरूरी पोषक तत्वों का एक बेमिसाल मिश्रण होता है और इसमें बड़ी तादाद में रोग-प्रतिकारक तत्व होते हैं जो बीमारी से लड़ने में मदद करते हैं।
  • शरीर की बीमारी से लड़ने की ताकत को बढ़ाकर शिशु को कई तरह की बीमारियों से बचाता है।
  • जन्म देने के बाद माँ के शुरूआती दूध को ‘कोलोस्ट्रम’ / Colostrum कहा जाता है। इस दूध में रोग-प्रतिकारक और पोषक तत्वों की भरमार होती है इसलिये इसे ‘लिक्विड गोल्ड’ भी कहा जाता है और यह दूध शिशु को जरूर पिलाना चाहिये।
  • जन्म देने के 3 से 5 दिनों के बाद माँ के शरीर में बनने वाले दूध में सुधार हो जाता है और यह दूध ‘कोलोस्ट्रम’ की तुलना में ज्यादा पतला और सफेद होता है। अब इस दूध में केवल उतना ही पानी, मिठास, प्रोटीन और वसा होती है जितना शिशु की पलने-बढ़ने के जरूरी है। इसके बाद माँ के दूध में पौष्टिक तत्वों की तादाद शिशु की जरूरत के हिसाब खुद-ब-खुद घटती-बढ़ती रहती है। 
  • पाॅउडर दूध या गाय के दूध की तुलना में माँ का दूध आसानी से पचता है।

पाॅवडर दूध और माँ के दूध में क्या फर्क हैं ?

  • माँ का दूध असानी से पच जाता है जबकि पाउडर दूध पचने में समय लगता है।
  •  माँ के दूध के लिये खर्च नहीं करना पड़ता।
  • माँ के दूध में पौष्टिक तत्वों की तादाद के अनुपात की बराबरी नहीं हो सकती।
  • जांचो में पता चला है कि माँ का दूध पीने वाले शिशुओं की रोग प्रतिकारक ताकत पाउडर दूध पीने वाले शिशुओं से ज्यादा अच्छी होती है।
  • माँ का दूध शिशुओं में डायरिया, कान और सांस के संक्रमण के खतरे को कम करता है।
  • ऐसे बहुत कम मामले सामने आये हैं जहाँ माँ का दूध पीने वाले बच्चों में लम्बे समय के बाद भी टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज़, मोटापा, दमा, दिल की बीमारी और एलर्जी जैसी परेशानियां हुई हों।
  • स्तनपान कराने में कम मेहनत लगती है क्योंकि इसमें दूध बनाने, हाथ धोने, बोतल या बर्तन को कीटाणु मुक्त करने जैसे काम नहीं करने पड़ते।
  • रात के समय, शिशु को लगातार दूध पिलाने के बाद भी, माताओं को ज्यादा आराम मिलता है क्योंकि इसके लिये उन्हें बार-बार रसोई में नहीं जाना पड़ता जैसा पाउडर दूध बनाने के लिये किया जाता है।
  • माँ का दूध पीने से शिशु और माँ के बीच अपनापन बढ़ता है और इससे उनके रिश्ते को जो मज़बूती मिलती है उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। पाउडर दूध के मामले में ऐसा नहीं होता।
  • शिशु को स्तनपान कराना माताओं के लिये भी बहुत फायदेमंद होता है। हालांकि, इसमें समय लगता है पर स्तनपान कराना, गर्भावस्था के दौरान बढ़े हुये वजन को कम करने का यकीनी तरीका है।
  • स्तनपान कराने वाली महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज, स्तन और आॅवेरिअन कैंसर होने की संभावन भी कम होती है।
  • स्तनपान कराना नई माताओं को प्रसव के बाद होने वाले अवसाद से निपटने और प्रसव में ज्यादा खून बहने की वजह से होने वाली खून की कमी की भरपाई के लिये मददगार होता है।
स्तनपान कैसे कराना चाहिए ?

शिशु को स्तनपान कराने का सही तरीका समय के साथ धीरे-धीरे सीखा जा सकता है, इसके लिये जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं है। इसके लिये गर्भावस्था और प्रसव के बारे में जानकारी देने वाली जगहों से; या परिवार के ऐसे सदस्य और दोस्त जिन्हें स्तनपान कराने का तर्जुबा हो, की सलाह ले सकते हैं पर कोशिश करें यह सीखते समय आप सभी एक साथ हों -आपके जीवनसाथी और परिवार के खास लोग।
  1. इसे सीखने के लिये समय देने के लिये तैयार रहें। याद रखें - शिशु को स्तनपान कराते समय ही दूध बाहर आता है।
  2. जन्म देने के एक घंटे के भीतर ही शिशु को अपना दूध पिलाना शुरू करें, इस समय अपनी सेहत का भी ध्यान रखें क्योंकि स्तनों में दूध भर जाने पर आप यह आसानी से महसूस कर सकती हैं इसलिये जरूरत के मुताबिक शिशु को स्तनपान कराती रहें।
  3. शिशु को अपनी गोद लेने के बाद आप जैसे ही आरामदायक स्थिति में आयें तो शिशु को उसका मुंह निप्पल के पास लाना सिखायें। शिशु को अपने स्तन के पास लाकर उसकी नाक या मुंह को निप्पल की बराबरी पर लाएं।
  4. आमतौर माँ के दूध की गंध की वजह से शिशु अपने मुंह को खुद-ब-खुद निप्पल के पास ले जाने लगते हैं। कुछ मामलों में एसा न होने पर शिशु के निचले होठ पर निप्पल से गुदगुदी करें जिससे वे अपना मुंह निप्पल के पास लाना सीख सकें।
  5. पहले 24 घण्टे के दौरान शिशु को 8-12 बार स्तनपान कराना चाहिए। एक बार स्तनपान कराने में 15-20 मिनट या इससे ज्यादा समय भी लग सकता है।
  6. शिशु भूखा होने पर क्या करता है, आपको उन इशारों के बारे में जानना भी जरूरी है। हो सकता है कि वह ज्यादा चैकन्ना हो जाये, तेजी से हाथ-पैर चलाये, रोये, अपने होठों को गुस्से में भींच ले या किसी भी चीज के उसके गाल या होठ के पास आने पर उसे चूसे।
  7. शिशु की हरकतों को पकड़ें। जैसे ही उसका पेट भरेगा - वह निप्पल छोड़ देगा या आराम से सो जायेगा। कुछ शिशु दो-तीन घूंट दूध पी कर ही सोने के आदी होते हैं तो माताओं को चाहिए कि ऐसे शिशुओं की पैरों में लगातार गुदगुदी करें या उनके कान को सहलायें जिससे वे भरपेट दूध पी सकें।
  8. हर बार दूध पिलाने के बाद शिशु को डकार दिलाने का ध्यान रखें। ऐसा न होने पर शिशु दूध पलट देते हैं और यह उनके नाक या मुंह से बाहर आ जाता है।

कैसे जाने शिशु भरपेट दूध पी रहा है या नहीं ?

जाने शिशु भरपेट दूध पि रहा है, यदि :
  1. दूध पिलाने के बाद स्तनों में नरमी और हल्कापन महसूस हो।
  2. शिशु को खुद ही डकार आ जाये।
  3. शिशु दिन भर में 8 से 20 बार साफ या हल्के पीले रंग का पेशाब करे।
  4. गीलेपन की वजह से दिन भर में 4 से 6 बार शिशु के डायपर बदलने की जरूरत पड़े।
पेरेन्ट्यून सुझावः अपने बिस्तर के सिरहाने शिशु को दूध पिलाने का एक चार्ट बना कर रखें जिससे आपको इस बारे में पता रहे। इसके साथ, हर बार दूध पिलाने के बाद स्तनों में बचे हुये दुध को निकाल दें और उन्हे सूखा रखें और बाद में शिशु को नुकसान न करने वाले किसी माॅइश्चराइजर का इस्तेमाल करें।

नई माताओं को होने वाली आम परेशानियां

  1. दूध न निकलनाः शुरूआत में यह किसी भी माँ के साथ हो सकता है पर एक या दो दिन के बाद आमतौर पर दूध निकलने लगता है लेकिन बिल्कुल दूध न निकलने पर आपको डाक्टर की सलाह लेने की जरूरत है। 
  2. दूध की कमीः यदि आपको लगता है कि शिशु आपके दूध से संतुष्ट नहीं हो पा रहा है तो यह पता करने की जरूरत है कि दूध निकालने वाले सुराख पूरी तरह से खुले हैं या नहीं - और शिशु को दूध पिलाना और पम्पिंग करना जारी रखें जिससे ज्यादा दूध बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिले।
  3. दूध का ज्यादा बननाः इसकी वजह से स्तनों का आकार बढ़ने और उनमें दर्द हो सकता है इसलिये जब आपको स्तनों में दूध का भराव महसूस हो तो इस बढ़े हुये दूध को दबा कर निकाल लें और आगे इस्तेमाल करने के लिये संभाल कर रखें। इस दूध को आप आस-पास के अस्पाताल में दे सकती हैं जिससे यह किसी वजह से अपने शिशु को दूध न पिला पाने वाली माता के काम आ सके। 
  4. दूध नली का बंद होनाः ऐसा तब होता है जब कोई दूध नली बंद हो जाती है जिसकी वजह से दूध पूरी तरह से बाहर नहीं निकल पाता और वहाँ सूजन आ जाती है। इसकी वजह से स्तन में गांठ पड़ जाती है जिसमें दर्द रहता है पर बुखार नहीं आता लेकिन अगर आपको बुखार आये तो यह एक तरह के स्तन संक्रमण का संकेत है जिसे मैसटीटिस कहा जाता है।
  5. अंदर दबे हुये/सपाट निप्पलः सपाट निप्पल दूध पीते समय बाहर तनने के बजाय अंदर धंस जाते हैं जिससे कई बार स्तनपान कराते समय कठिनाई होती है; स्तनपान कराते समय इन्हे आप उंगली से दबा कर या पम्पिंग के जरिये बाहर निकाल सकती हैं।

शिशु को होने वाली परेशानियांः

  1. शिशु का स्तनपान की जगह ठीक से न पहचान पानाः इसकी वजह से माँ और शिशु दोनों को कठिनाई होती है। 
  2. दूध छिद्रों का बंद होनाः यदि निप्पल के छिद्र पूरी तरह न खुले हों तो शिशु को देर तक दूध पिलाते रहने के बाद भी वह रोता रहता है। इससे निजात पाने के लिये जबरन दोनों हाथों से दबा कर दूध निकालने के बजाय निप्पल की हल्की गर्म सिकाई करें। ऐसा करने से सभी बंद सुराख खुल जायेंगे।
  3. उलझन में पड़नाः स्तनपान कराने में तरह-तरह के तरीकों के साथ कई तरह की चुसनी का इस्तेमाल करने पर शिशु उलझन में पड़ने लगते हैं और ऐसे में मुमकिन है कि शिशु ठीक से स्तनपान न कर सके और वे चिड़चिड़ाने लगते हैं।
  4. स्तनपान करा रही माताओं को हल्का और पौष्टिक खाना खाना चाहिए जिससे शिशु को गैस की तकलीफ से बचाया जा सके। स्तनपान कराने के पूरे समय के दौरान खाने में कैल्शियम, विटामिन डी और आयरन सप्लीमेंट को शामिल करना चाहिये।

जुड़वा या दो से ज्यादा शिशुओं का स्तनपानः

जुड़वा या दो से ज्यादा शिशुओं को स्तनपान कराना किसी माँ के लिये मुश्किल भरा हो सकता है और जुड़वा शिशुओं के तय समय से पहले पैदा होने की वजह से उन्हे ज्यादा स्तनपान कराने की जरूरत भी होती है। ऐसे में डबल् पम्पिंग की मदद से दूध की जरूरत को पूरा किया जा सकता है क्योंकि आप जितना ज्यादा पम्पिंग की मदद लेंगी, शरीर में दूध भी उतना ज्यादा बनेगा।

आप उन्हे एक-एक करके या ‘डबल् क्रेडल पोजीशन’ का इस्तेमाल करते हुए एक साथ स्तनपान करा सकती हैं। इसके लिए सबसे पहले आरामदायक स्थिति में बैठ जायें। दोनों शिशुओं को सामने लाकर इस तरह अपनी गोद में ले जिससे उनके सिर आपके बाजुओं पर अंदर की ओर हों। 

स्तनपान, कामकाजी माताऐं और इसके लिये कानूनः

बहुत से देशों में शिशु को स्तनपान कराने वाली कामकजी माताओं को घर में रहकर ही आॅफिस के काम करने की सहूलियत दी गयी है। इसके अलावा उनके काम करने वाली जगह पर में अलग से कुछ जगह स्तनपान/पम्पिंग करने के लिये बनाई जाती है और आॅफिस में ही एक शिशुओं की देखभाल और ध्यान रखने के लिये पालना-घर भी होते हैं जहाँ माताऐं अपने शिशु को स्तनपान करा सकती है। 

भारत में महिलाओं को प्रसूति के बाद वेतन सहित तीन महीने का छुट्टियां मिलती है पर इसके बाद उन्हे खुद तय करना करना होता है कि वे काम करने के दौरान शिशु को स्तनपान करायें या उसे पाउडर दूध पिलायें क्योंकि हमारे यहाँ स्तनपान कराने वाली कामकाजी माताओं के लिये इस तरह की कोई सहूलियत नहीं दी गयी है।

हालांकि, इस सम्बंध में पहले से जारी कानून में बदलाव की मांग की गई है पर जबतक नये सुझाव ठीक तरह से लागू नहीं होते, नई माताओं को सलाह है कि वे शिशु को स्तनपान कराने के लिये अपने काम करने वाली जगह पर अलग से कुछ जगह और पालना-घर के लिए मांग करें।

आपके शिशु की सलामती सबसे पहले है तो इसकी रक्षा के लिये कुछ भी करना पड़े, करिये। 

क्या यह लेख उपयोगी लगा? स्तनपान कराने को लेकर अपने खास लम्हों के बारे में हमें बतायें - हमें आपकी राय जानना अच्छा लगेगा। 

यह लेख हमारे साथ Parentune team ने साझा किया हैं। Parentune भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली पेरेंटिंग कम्युनिटी है जो पेरेंट्स को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त सलाह और सहयोग देती हैं। और जाने Parentune के बारे में - http://www.parentune.com/ 


एक माँ होते हुये क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है चांदी के बर्तनों में ऐसा क्या है जो हमारे बुर्जुगों को यह सलाह देने के लिये प्रेरित करता है कि बच्चों को खाने-पिलाने के लिए चाँदी के बर्तनों इस्तेमाल किया जाए? गर्भवती माताओं और बच्चों से जुड़ी रस्मों में खासतौर पर चांदी के उपहार ही देने को अहमियत क्यों दी जाती है?

जाहिर तौर पर, ऐसा माना जाता है कि चांदी की कीटाणुओं से लड़ने वाली खूबियां शिशु की रोग प्रतिकारक ताकत बढ़ाने में मददगार होती हैं इसलिए नई माताओं को अपने शिशु को चांदी के चम्मच से खाने-पिलाने के लिये सलाह दी जाती है।

हम बस आंख बंद करके अपने बड़ों की मान्यता और उनके तर्जुबे पर भरोसा कर लेते है पर हम आज इस लेख में आपको बच्चों को चांदी के बर्तनों में खाने-पिलाने से होने वाले 5 रोगनाशक फायदों के बारे में बताएँगे। 


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बच्चों को चांदी के बर्तनों में खिलाने के फायदे Health benefits of Silver utensils in Hindi

बच्चों को चांदी के बर्तनों में खिलाने के प्रमुख 5 फायदे इस प्रकार हैं :

1. चांदी में कीटाणू नहीं पनपते
ऐसा माना जाता है कि चांदी 100 प्रतिषत कीटाणु मुक्त होती है। इसी वजह से हमारे बड़े यह सलाह देते हैं कि बच्चों को दी जाने वाली खाने-पीने की चीजें चांदी के बर्तनों में दी जाएं। इसके साथ-साथ यह भी सच्चाई है कि चांदी में कीटाणु नहीं पनप सकते, इसलिये इन बर्तनों में कीटाणु खत्म करने के लिए किसी खास साफ-सफाई की जरूरत नहीं होती बस गर्म पानी से साधारण धुलाई करने से भी यह बर्तन दुबारा इस्तेामाल किये जा सकते हैं।

2. चांदी बच्चों की रोग प्रतिकारक ताकत / Immunity बढ़ाती है
कीटाणू खत्म कर देने वाली खूबी होने की वजह से चांदी के बर्तनों में खाने-पीने से शिशुओं और बच्चों की रोग प्रतिकारक ताकत बढ़ती है। इसकी दूसरी खासियत यह है कि चांदी के बर्तन में गर्म खाना परोसे जाने पर इसका असर हमारे खाने पर भी होता है क्योंकि कीटाणू खत्म करने वाली खूबियां खाने में मिल जाती हैं इसीलिये शिशु और बच्चों को खाने-पीने में चांदी के बर्तनों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है।



3. चांदी का गैर-विषाक्त होना
चांदी में गैर-विषाक्त या जहरीले तत्वों के खात्मे की खूबी होना एक बहस का मुद्दा है क्योंकि खालिस चांदी को जहरीला माना जाता है, पर दूसरी ओर यह मान्यता भी है कि खालिस चांदी को तपा कर बने बर्तनों में गैर-विषाक्तता बढ़ जाती है और इसमें जहरीले तत्वों का खात्मा करने का गुण आ जाता है इसीलिये ऐसा विश्वास है कि चांदी के बर्तन में खाने-पीने से न केवल जहरीले तत्वों से बचाव होता है बल्कि बच्चों की रोग प्रतिकारक ताकत भी बढ़ती है।

4. चांदी तरल चीजों की ताजगी बनाए रखती है
ऐसा माना जाता है कि चांदी के बर्तन में पानी या कोई अन्य तरल चीजों के रखे जाने पर इनकी ताजगी काफी समय तक बरकरार रहती है। पुराने समय मे, राजा-महाराजा अपने पीने के पानी और यहां तक कि शराब को भी चांदी की सुराही में रखा करते जिससे उसका स्वाद और ताजापन बरकरार रहे।

5. शरीर के तापमान को काबू में रखती है
चांदी में शिशु और बच्चों को फायदा पहुंचाने वाली हजारों खूबियां होती हैं और इनमें से एक है कि चांदी का इस्तेमाल हमारे शरीर के तापमान को काबू में रखता है और सामान्य बनाये रखता है और जाहिर तौर पर यही वजह है कि नवजात शिशुओं को पहनाये जाने वाले सामान चांदी के बने होते हैं।

यदि आप भी चांदी के अन्य दूसरे फायदों के बारे में जानती हैं तों हमे बतायें।
यह लेख हमारे साथ Parentune team ने साझा किया हैं। Parentune भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली पेरेंटिंग कम्युनिटी है जो पेरेंट्स को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त सलाह और सहयोग देती हैं। और जाने Parentune के बारे में - http://www.parentune.com/ 

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एक अनुमान के मुताबिक भारत में 8 से 10 करोड़ लोगों को Diabetes है और यह संख्या हर वर्ष तेजी से आगे बढ़ रही है। हमारी बिगड़ी हुई जीवन शैली और खानपान की आदतों के कारण भारत में डायबिटीज संक्रामक बीमार की तरह फैल रहा है।

डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जो कि अगर एक बार हो जाए तो अधिकतर मरीजों को इसका उपचार जिंदगी भर करना होता है। डायबिटीज के रोगियों का मुख्य उद्देश उनके ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखना होता है। डायबिटीज से होने वाले दुष्परिणाम से बचने के लिए आपके ब्लड शुगर की मात्रा नियंत्रण में होना बेहद जरूरी होता है। 

शुक्र है की डायबिटीज के रोगी पहले की तुलना में इस रोग की देखभाल को लेकर सतर्क हो गए हैं। घर पर ब्लड शुगर की जांच करने के लिए अब Glucometer उपलब्ध होने से डायबिटीज की देखभाल सहज और सस्ती हो गयी हैं। अब आप घर पर ही ग्लूकोमीटर की सहायता से आसानी से अपने ब्लड शुगर की मात्रा का पता लगा सकते हैं और शुगर लेवल बेहद बढ़ जाने या कम हो जाने की स्तिथि में तुरंत डॉक्टर से संपर्क कर सकते हैं। 

डायबिटीज के रोगियों ने ग्लूकोमीटर का इस्तेमाल किस तरह करना चाहिए इसकी जानकारी आज इस लेख में हम दे रहे हैं। अगर आप डायबिटीज के रोगी है या आपके जान पहचान में किसी को डायबिटीज है तो यह लेख आपने अवश्य पूरा पढ़ना चाहिए और इसे अपने डायबिटीज से पीड़ित मित्र-परिवार के साथ शेयर भी करना चाहिए। 


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कैसे करे Glucometer का सही उपयोग ? How to use Glucometer in Hindi

आजकल बाजार में कई तरह के ग्लूकोमीटर मौजूद है परंतु सभी प्रकार के ग्लूकोमीटर का काम करने का तरीका लगभग एक सा है। ग्लूकोमीटर में प्रमुख 3 चीजे होती हैं - ग्लूकोमीटर मशीन, सुई और ग्लुको स्ट्रिप 
  • सबसे पहले आपको ग्लूकोमीटर मशीन को चालू करना होता है। इस पर दिए हुए बटन को दबाकर आप इसे चालू कर सकते हैं। अगर स्क्रीन पर चालू करने के बाद कुछ नहीं आ रहा है तो आप यह देखें कि उसमें बैटरी या सेल डाला हुआ है या नहीं। 
  • ग्लूकोमीटर चालू करने के पश्चात ग्लूकोमीटर के साथ मिली हुई ग्लुको स्ट्रिप को ग्लूकोमीटर के अंदर डालिए। ग्लूकोमीटर के स्ट्रिप की 2 बाजू होती है। एक तरफ आपको ब्लड का ड्राप लगाना होता है तो दूसरी और जहां लाइनिंग होती है वह आपको ग्लूकोमीटर के अंदर डालना होता है। 
  • ग्लूकोमीटर में स्ट्रिप डालने पर उस पर ब्लड ड्रॉप का चिन्ह आता है इसका मतलब ग्लूकोमीटर अब तैयार है। 
  • ग्लूकोमीटर में उंगली से ब्लड निकालने के लिए एक सुई / needle होती है जिसे डॉक्टर लांसेट भी कहते हैं। कुछ ग्लूकोमीटर में सुई को मजबूती से पकड़ने के लिए लैंसेट होल्डर भी होता है। 
  • उंगली से ब्लड का सैंपल लेने से पहले उसे स्पिरिट से साफ करें और स्पिरिट को सूखने दे। 
  • अब जिस उंगली से ब्लड सैंपल लेना है उसे दबाकर रखें और बाद में सुई चुभाए।चिकित्सक सलाह देते हैं कि उंगली का पहला ड्रॉप इस्तेमाल ना करें, उसे कॉटन से साफ करे। दूसरा ड्रॉप ग्लुको स्ट्रिप पर लगाएं। 
  • ब्लड ड्राप को टेस्ट स्ट्रिप पर रखने के 5 से 45 सेकंड में ग्लूकोमीटर ब्लड शुगर लेवल बता देता है। इसके बाद लैंसेट और स्ट्रीप दोनों को सही से डस्टबिन (Bio Medical Waste) में फेंक दे। 
  • एक ही उंगली से बार-बार ब्लड ड्राप नहीं निकाले। एक ही सुई का बार-बार उपयोग ना करें ताकि इन्फेक्शन और दर्द ना हो। एक्सपायर हो चुके टेस्ट रिप से ब्लड शुगर जांचेंगे तो गलत परिणाम मिलेंगे।
  • कुछ ग्लूकोमीटर में टेस्ट स्ट्रिप्स के हर पैकेट के साथ एक कोड आता है जिसे ग्लूकोमीटर में लगाना जरूरी होता है। इसके बाद ही ग्लूकोमीटर ठीक से काम करता है। 
  • ग्लूकोमीटर के साथ में मैन्युअल की बुकलेट भी आती है जिसमे ग्लूकोमीटर को उपयोग करने की सारी जानकारी होती हैं। मैन्युअल के अंदर एरर कोड की सूची भी होती है जो कि ग्लूकोमीटर में कोई एरर दर्शाने पर आपके काम आ सकती है। 

ग्लूकोमीटर का उपयोग करते समय क्या ध्यान रखे ?

  1. अगर आपको भूखे पेट शुगर जांच करना है तो कम से कम 8 से 10 घंटा भूखा होने के बाद ही खाली पेट जांच करें। अगर आपके खाली पेट शुगर जांच की संख्या 70 से 110 mg/dl से कम या ज्यादा आती है तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें। 
  2. अगर आपको खाना खाने के बाद की शुगर जांच करनी है तो खाना खाने के 2 घंटे बाद ग्लूकोमीटर से जांच करें। इसकी संख्या अगर 110 से कम या 140 से ज्यादा आती है तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें। 
  3. अगर आप डायबिटीज के रोगी है और आपको घर पर अचानक चक्कर आना या बेहोशी जैसा महसूस होता है तो तुरंत अपनी शुगर टेस्ट करें। शुगर लेवल 60 mg/dl से कम आने पर तुरंत कुछ मीठा खा लें और अपने डॉक्टर से संपर्क करें। 
  4. अगर ग्लूकोमीटर में आपके ब्लड शुगर की मात्रा HI लिखकर आती है तो इसका मतलब है कि आपकी ब्लड शुगर की मात्रा 500 से अधिक है और ऐसी स्थिति में भी आपको तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। 
  5. अगर ग्लूकोमीटर में आपके ब्लड शुगर की मात्रा LO लिखकर आती है तो इसका मतलब है कि आपकी ब्लड शुगर की मात्रा 50 से कम है और ऐसी स्थिति में भी आपको कुछ मीठा खाना चाहिए और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। 
  6. हमेशा अपने ब्लड शुगर का रिकॉर्ड रखें और डॉक्टर को जब भी दिखाने जाए तब यह रिकॉर्ड अपने साथ रखें। 
  7. हर दो-तीन महीने में ग्लूकोमीटर और लेबोरेटरी दोनों में एक साथ ब्लड टेस्ट कराएं और दोनों के जांच के रिपोर्ट का तुलना करें। अगर दोनों में काफी अंतर है तो फिर आपको ग्लूकोमीटर बदल देना चाहिए। 
इस तरह Glucometer यह डायबिटीज के रोगियों के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और उपयोगी मशीन है जिसे हर डायबिटीज के रोगी ने अपने घर में जरूर रखना चाहिए। ग्लूकोमीटर की मीटर की सहायता से आप अपने डायबिटीज को अच्छी तरह से नियंत्रित कर सकते है और साथ ही इमरजेंसी में जल्द अपनी ब्लड शुगर का पता लगा सकते हैं।

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योनि मार्ग से होनेवाले गाढ़े, सफेद या हल्के पीले स्त्राव को Leucorrhoea या श्वेत प्रदर कहा जाता है। सामान्य भाषा में इसे ही "सफ़ेद पानी जाना" या White discharge भी कहा जाता हैं। श्वेत प्रदर के बहुत से कारण होते हैं, लेकिन सामान्य तौर पर एस्ट्रोजन हार्मोन का असंतुलन इसका मुख्य कारण होता है। 

लगभग हर महिला को कभी न कभी कुछ समय के लिए यह समस्या होती है और कुछ महिलाओं में तो यह सफ़ेद पानी की समस्या इतनी बढ़ जाती है की डॉक्टर से मिलकर इसका लम्बा उपचार कराना पड़ता हैं। आज इस लेख में हम सफ़ेद पानी जाने से जुडी सारी जानकारी देने जा रहे हैं। 

श्वेतप्रदर या सफ़ेद पानी जाने के कारण, लक्षण, उपचार और घरेलु नुस्खों से जुडी सारी जानकारी निचे दी गयी हैं :  
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सफ़ेद पानी (श्वेतप्रदर) जाने का कारण, लक्षण और उपचार Safed pani ka desi gharelu ilaj

महिलाओं में सफ़ेद पानी जाने का कारण क्या हैं ? Safed pani ka karan

श्वेतप्रदर या सफेद पानी जाना इसे हम दो रूप में देख सकते है।
  1. स्वाभाविक - सामान्यतः यह non pathological होता है और कई बार यह अपने आप बंद होता है और कई बार फिर से शुरू होता है। माहवारी के पहले, माहवारी के बाद, अण्डोत्सर्ग के समय या यौन सम्बन्ध के वक्त सफेद स्त्राव होना स्वाभाविक होता है। सम्भोग के दौरान अगर स्त्राव कम मात्रा में होता है तो दर्द हो सकता है। कई बार यह लड़कियों में पहला मासिक आने के पहले भी होता है और इसे युवावस्था का लक्षण मान सकते हैं। कई बार नवजात बालिकाओं में भी कुछ समय तक सामान्य लिकोरिया रह सकता है।
  2. बीमारी या बीमारी का लक्षण स्वरूप - योनिगत संक्रमण या STD बीमारी के वजह से स्त्राव की मात्रा बढ़ जाती है साथ ही  इसमें चिकित्सा की जरूरत होती है।

ल्यूकोरिया / सफ़ेद पानी का निदान कैसे करते हैं ?

जब हम योनि के स्त्राव का माइक्रोस्कोप में परीक्षण करते हैं अगर उसमे 10 से ज्यादा WBC मिलते हैं तब उस अवस्था को ल्यूकोरिया कहा जाता है। अगर सफेद स्त्राव कभी-कभी होता है और उसका प्रमाण भी कम रहता है तो यह सामान्य बात है इसमें कोई चिकित्सा की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन अगर अत्यधिक स्त्राव होना, स्त्राव के रंग में बदलाव होना, उससे अजीब सी गंध आना यह लक्षण दिखाई दे तो यह या तो किसी संक्रमण , हार्मोन्स में बदलाव या कैंसर की वजह से हो सकता है इसके लिए योग्य चिकित्सा की आवश्यकता होती है। 

Physiologic leucorrhoea / स्वाभाविक श्वेतप्रदर क्या हैं ?

  • सामान्यतः एस्ट्रोजन हार्मोन के उत्तेजित होने से होने वाले स्त्राव को फिजियोलॉजिकल लिकोरिया कहा जाता है।
  • यह कोई गंभीर समस्या नहीं है, पर इसे जितनी जल्दी हो उतनी जल्दी सुलझाना अच्छा रहता है। 
  • कई बार यह शरीर की नैसर्गिक संरक्षण प्रक्रिया होती है जिसके तहत योनि का PH बनाए रखने के लिए साथ ही योनिगत पेशियों में लचीलापन रखने के लिए सामान्यतः थोड़ा स्त्राव होता है।
  • कई बार गर्भावस्था में भी एस्ट्रोजन के साथ योनि का रक्तसंचलन बढ़ने की वजह से सामान्य श्वेतप्रदर होता है। 
  • इसके अलावा अत्यधिक उपवास, अधिक वजन उठाने, कामुक चित्रदर्शन, अश्लील वार्तालाप, गलत तरीके से सम्भोग, रोगी व्यक्ति के साथ सम्भोग, योनि की अस्वच्छता,कॉपर टी के प्रयोग के कारण, बार बार गर्भपात करना, अनियमित जीवनशैली जैसे रात्री जागरण,अनियमित भोजन, क्रोध, मानसिक तनाव आदि कई वजहों से भी श्वेतप्रदर हो सकता है। 

Pathological leucorrhoea / संक्रमित श्वेतप्रदर क्या हैं ?

  • इसमें स्त्री के योनि से सफेद,पीला, मटमैला , गाढ़ा स्त्राव अधिक मात्रा में निकलता है। 
  • योनिगत श्लैष्मिक त्वचा में संक्रमण, सूजन या अन्य कोई बीमारी आदि की वजह से यह स्त्राव होता है। 
  • इस वजह से स्त्री कमजोर हो जाती है। 
  • कई बार शर्म या संकोच की वजह से ज्यादातर स्त्रिया यह बात छुपाती है जिस वजह से कई बार यह काफी गंभीर समस्या बन जाती है और इसकी चिकित्सा में समय भी अधिक लगता है।
  • स्त्राव के अलावा इसमें कुछ अन्य लक्षण भी दिखते हैं, जैसे की 
  1. योनिस्थान में खुजली
  2. कमरदर्द
  3. पेट के निचले हिस्से में दर्द
  4. बार बार पेशाब आना
  5. चक्कर या आंखों के सामने अंधेरा आना
  6. पिंडलियों में खिंचाव
  7. कमजोरी लगना
  8. चिड़चिड़ापन
  9. सिरदर्द
  10. भूक कम लगना
  11. कैल्शियम की कमी होना

योनिस्राव के विविध स्वरूप 

  • योनि ग्रीवा से उत्पन्न श्लैष्मिक बहाव को योनिक स्त्राव कहा जाता है। 
  • योनिक स्त्राव एक सामान्य प्रक्रिया है जो मासिक चक्र के अनुसार होती रहती है। 
  • कई बार मासिक धर्म आने के पूर्व एवं बाद में तथा अंडोत्सर्ग के समय योनि से सफेद स्त्राव होता है यह एक सामान्य प्रक्रिया है। 
  • यह सफेद एवं चिकना, गंध रहित होता है। सामान्यतः इस में खुजली नहीं होती अगर इस में खुजली हो तो यह फंगल या मिक्स बैक्टीरियल इंफेक्शन हो सकता है। 
  • साफ एवम पानी जैसा स्त्राव महिलाओं में कई बार होता है खासतौर पर भारी व्यायाम या वजन उठाने पर कई महिलाओं में इसकी शिकायत होती है लेकिन यह भी सामान्य रहता है। 
  • जब यह स्त्राव पीला, हरा, अधिक गाढ़ा, अधिक मात्रा या बदबू लिए होता है तब यह असामान्य होता है। उस वक्त डॉक्टर के पास जाकर चिकित्सा की आवश्यकता होती है।

असामान्य यौनिक स्त्राव के कारण 

यह इन कारणों से हो सकता है :
  1. योनि में फंगल, बैक्टीरियल या मिक्स संक्रमण
  2. यौन सम्बन्धों से होनेवाला संक्रमण 
  3. शरीर की रोगप्रतिकारक क्षमता कम होने से होनेवाला संक्रमण। खासकर मधुमेह व्याधि में अक्सर फंगल इन्फेक्शन हो जाता है।

सफ़ेद पानी / ल्यूकोरिया का उपचार एवम बचाव Safed pani ka upchar 

  • श्वेत प्रदर के चिकित्सा में सबसे पहला उपाय है योनि की स्वच्छता रखें।
  • प्रत्येक बार मल मूत्र विसर्जन के पश्चात मिथुन के पश्चात योनि को साफ पानी से धोना आवश्यक होता है।
  • एक टब में गुनगुना पानी लेकर उसमें एक चम्मच बोरीक पाउडर डालें और इस में बैठे। इससे जननांगों की सफ़ाई और सिकाई भी होगी।
  • फिटकरी युक्त पानी से योनिमार्ग की सफाई करें।
  • बार बार गर्भपात कराने से भी संक्रमण होकर श्वेत प्रदर की समस्या हो सकती है इसलिए अनचाहे गर्भ स्थापन के प्रति सतर्कता बरतते हुए उचित गर्भनिरोधक उपायों का प्रयोग करें एवं एक या दो संतान उत्पत्ति के पश्चात नसबंदी का ऑपरेशन करा ले।
  • सफेद पानी की शिकायत होने पर बिना विलंब डॉक्टर को बताएं ताकि उसका जल्द-से-जल्द इलाज हो सके और उसकी वजह से ज्यादा संक्रमण ना हो पाए।
  • अगर आपको मधुमेह है तो रक्तशर्करा को नियंत्रण में रखे। 
  • कब्ज मत होने दे। 
  • असुरक्षित यौन सम्बन्धों से बचे। 
  • कामुक विचारों से दूर रहे। अच्छा साहित्य पढ़े।

श्वेतप्रदर / सफ़ेद पानी से बचने के घरेलू उपाय Safed pani ka desi ilaj 

  1. पौष्टिक आहार लें जिससे कि आपकी रोगप्रतिकारक क्षमता बढें। जैसे चोकरयुक्त आटे की रोटी, दालें, जौ का दलिया, हरी सब्जियां, सलाद, फल, चुकंदर, टमाटर, गाजर, काली मिर्च, सुकामेवा आदि को अपने आहार में शामिल करें।
  2. मिर्च मसाले से युक्त, तला हुआ भोजन, बहुत अधिक मात्रा में बैंगन, लहसुन,प्याज, आलू, बासी खाना, अधिक खटाई युक्त आहार आदि अपने आहार में ना ले।
  3. चाय , कॉफी से दूर रहे।
  4. बबूल की छाल और अशोक की छाल पानी में उबाल लें और इस पानी को छानकर इसमें फिटकरी मिलाकर इससे योनि की सफाई करें।
  5. एक चौथाई चम्मच फिटकरी का पाउडर की फक्की सुबह शाम पानी के साथ लेने से भी श्वेत प्रदर ठीक होता है।
  6. गुलाब के ताजे फूलों की पत्तियों को मिश्री के साथ खाकर ऊपर से ठंडा मीठा दूध सुबह शाम पिये। इससे करीब 1 हफ्ते में श्वेत प्रदर के साथ पेशाब में जलन एवं शरीर की गर्मी भी कम हो जाएगी।
  7. आयुर्वेद के अनुसार चावल का धोवन यह श्वेत प्रदर के लिए काफी अच्छा रहता है। 10 ग्राम नागकेसर लेकर चावल के धोवन के साथ पीसे एवम इसमें मिश्री मिलाकर रोज एक कप पीने से कुछ दिनों में श्वेत प्रदर की समस्या कम हो जाएगी।
  8. 1 चम्मच शहद में आधा चम्मच आंवले का पाउडर करीब 1 महीने तक लेने से श्वेत प्रदर में आराम मिलेगा। 
  9. चावल के मांड में स्वादानुसार नमक या शक्कर और भुना जीरा मिलाकर आधा गिलास पीने से भी लाभ मिलेगा। आप चाहे तो आधा गिलास छाच एवं आधा ग्लास मांड मिलाकर भी पी सकते हैं।
  10. जीरा व मिश्री को समान मात्रा में मिलाकर पीस कर रखे एवं इसे सुबह शाम एक एक चम्मच चावल के धोवन के साथ ले।
  11. केले का प्रयोग जरूर करें। चाहे तो आप खाने के बाद केला ले या दूध में केला मिलाकर खाए या केले में घी मिलाकर खाए। केले के प्रयोग से श्वेत प्रदर में काफी राहत मिलती है।
  12. बड़ी इलायची व माजूफल को समान मात्रा में लेकर पिस ले एवं इनके चूर्ण की दो-दो ग्राम की मात्रा में सुबह शाम पानी के साथ कुछ दिन तक लेने से प्रदर रोग ठीक हो जाएगा।
  13. गोंद को कुछ मात्रा में लेकर घी में तल लें फिर इसमें पानी व शक्कर डालकर उबालकर छानकर प्रतिदिन एक कप पिए, इस से सफेद पानी के साथ कमर दर्द, पिंडलियों में दर्द की तकलीफ भी कम होगी।
  14. आंवला चूर्ण करीब 3 gm की मात्रा में हर रोज सुबह शाम शहद के साथ करीब 1 महीने तक ले।
  15. मुलहठी के चूर्ण को सुबह शाम 1 ग्राम की मात्रा में कुछ दिनों तक ले।
  16. कमर दर्द या जोड़ों के दर्द के लिए त्रिफला गुग्गुल सुबह शाम पानी के साथ लें। अशोकारिष्ट, लोध्रसव जैसी दवाइयां भी आप डॉक्टर के सलाह से ले सकते है। 
  17. गाजर, पालक, गोभी एवं चुकंदर का सूप रोजाना पीने से गर्भाशय की सूजन कम होती है एवम श्वेत प्रदर में लाभ होता है। साथ ही आपका हीमोग्लोबिन भी बढ़ने में मदद होती है।
  18. रोजाना सुबह कच्ची भिंडी खाने से भी श्वेत प्रदर में आराम मिलेगा।
  19. मेथी दाने का पाक या मेथी के लड्डू खाने से भी श्वेत प्रदर में आराम मिलता है एवं शरीर भी पुष्ट होता है। गुड व मेथी का चूर्ण एक एक चम्मच मिलाकर सुबह-शाम खाने से प्रदर रोग में राहत मिलती है।
  20. फालसे का शर्बत पीने से भी श्वेत प्रदर में आराम मिलता है। 
  21. आप चाहे तो किसी अच्छे आयुर्वेदिक डॉक्टर से परामर्श करके भी श्वेत प्रदर के चिकित्सा करा सकते हैं।
  22. अपने दैनंदिन जीवन में योग अभ्यास को जरूर शामिल करें।
जो महिलाएं शर्म के कारण डॉक्टर के पास नहीं जा सकती है या जिन्हें थोड़ी तकलीफ है वह यह घरेलू उपचार आजमा सकते हैं लेकिन अगर ज्यादा परेशानी हो तो चिकित्सक का परामर्श अवश्य लें। 
इस तरह योग्य आहार, उचित व्यायाम, योगा, शारीरिक स्वच्छता साथ ही आवश्यकता पड़ने पर घरेलू उपचार एवं डॉक्टर की चिकित्सा के द्वारा आप श्वेत प्रदर की समस्या से निजात पा सकते हैं।
अगर यह महिलाओं में सफ़ेद पानी जाने / ल्यूकोरिया से जुडी जानकारी आपको उपयोगी लगती है तो कृपया इसे शेयर अवश्य करे !
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