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Varicose Veins / वैरिकोस वेंस, यह नसों का एक बेहद पीड़ादायक रोग हैं। पैरों की नसों की वाल्व कमजोर होने के कारण ग्रेविटेशनल फाॅर्स के चलते इन नसों में जमना शुरू हो जाता हैं जिसके चलते पैरों की नसों में सूजन आ जाती है और नसे नीली पड़ जाती हैं। 

Varicose Veins का अगर समय पर उपचार न किया गया तो इसकी वजह से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती हैं। Varicose Veins एक ऐसा रोग है जिसे हम उचित उपाय योजना कर शुरुआती दौर में ही रोक सकते हैं पर इसके लिए हमें Varicose Veins में लिए जानेवाली सावधानी और घरेलु उपचार की पूरी जानकारी होना आवश्यक हैं।

Varicose Veins होने पर क्या करे इसके पहले इसके कारण और इसका निदान करने के लिए Varicose Veins के कारण और लक्षण भी पता होना चाहिए। Varicose Veins के कारण और लक्षण की जानकरी जानने के लिए यहाँ क्लिक करे - Varicose Veins के कारण, लक्षण और दुष्परिणाम 

Varicose Veins के आधुनिक, आयुर्वेदिक और घरेलु उपचार की जानकारी निचे दी गयी हैं :

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Varicose Veins के आधुनिक, आयुर्वेदिक और घरेलु उपचार
Varicose Veins Treatment, Ayurveda and Home Remedies in Hindi

Varicose Veins का उपचार कैसे किया जाता हैं ?
Treatment of Varicose Veins in Hindi

Varicose Veins के लिए किये जानेवाले विभिन्न उपचार की जानकारी निचे दी गयी हैं :
  1. खास जुराबे / Compression Stockings : Varicose Veins में धीमे पड़े हुए रक्त के बहाव को फिर से गति देने के लिए और Varicose Veins में खून इखट्टा होने से रोकने के डॉक्टर रोगी को विशेष दबाव देने वाले जुराबे / socks जिसे मेडिकल भाषा में Compression Stocking कहा जाता हैं, पहनने के लिए देते हैं। ऐसे जुराबे पहनने से Varicose Veins को शुरुआती दौर में ही रोका जा सकता हैं। 
  2. इंजेक्शन / Sclerotherapy : अगर जुराबे पहनकर भी Varicose Veins में कोई बदलाव नहीं आ रहा है तो ऐसे फूली हुई Varicose Veins में डॉक्टर एक विशेष प्रकार का इंजेक्शन देते हैं जिससे ऐसे Varicose Veins में रक्तप्रवाह बंद हो जाता है और Varicose Veins मुरझा कर निकल जाते हैं। इसके लिए आपरेशन में दाखिल होने की जरुरत नहीं होती और नाही ही रोगी को बेहोश करना पड़ता हैं। 
  3. लेज़र / Laser Therapy : आजकल बड़ी और छोटी Varicose Veins को लेज़र के नए तरीके से निकाला जाता हैं। Varicose Veins पर लेज़र लाइट देकर उन्हें बंद किया जाता है जिससे वह मुरझा कर निकल जाते हैं। इस उपचार में रोगी को कोई इंजेक्शन देने की भी जरुरत नहीं पड़ती हैं। 
  4. अन्य / Others : ऊपर दिए हुए तरीको के अलावा जरुरत पड़ने पर Ligation-Stripping, Ambulatory Phlebectomy या Endoscopic Varicose Veins Surgery भी की जा सकती हैं। गर्भावस्था में निर्माण होनेवाली Varicose Veinsकी समस्या बिना इलाज के भी डिलीवरी के बाद 3 से 12 महीने में ठीक हो जाता हैं।    

Varicose Veins के आयुर्वेदिक उपचार और घरेलु नुस्खे
Ayurveda and Home Remedies for Varicose Veins in Hindi

Varicose Veins को शुरुआती दौर में ही निचे दिए हुए आयुर्वेदिक और घरेलु उपाय अपनाकर काबू में किया जा सकता हैं। 
  • जीवनशैली / Lifestyle : अगर आप सुस्त जीवनशैली जी रहे है तो तुरंत अपने जीवनशैली में बदलाव लाये। रोजाना कम से कम 1 घंटा कोई व्यायाम करे जैसे की चलना, जॉगिंग, दौड़ना, स्विमिंग, एरोबिक, साइकिल चलाना इत्यादि। लंबे समय तक लगातार बैठे या खड़े न रहे। अधिक भारी वजन न उठाये। रात को सोते समय पैरों के निचे 2 तकिये रखे। बैठते समय एक पैर के ऊपर दूसरा पैर मोड़कर न रखे। 
  • कपडे / Cloths : अधिक तंग / tight कपडे, जुराबे या जूते न पहने। हाई हील वाली सैंडल न पहने। 
  • आहार / Diet : संतुलित आहार ले। अधिक फास्टफूड या नमकीन या तलीहुई चीजों का सेवन न करे। खाने में नमक का प्रमाण कम रखे। अपने आहार में विटामिन B और विटामिन C युक्त आहार का समावेश अधिक करे जैसे की अमरुद, संतरा, बीटरूट, टमाटर, सूर्यफुल बीज, केला, अवाकाडो, रतालू इत्यादि। लहुसन, प्याज और अदरक जैसे एंटी ऑक्सीडेंट का सेवन करने से भी लाभ होता हैं। 
  • मोटापा / Obesity : अगर आपका वजन सामान्य से ज्यादा है तो इसे नियंत्रण मे करे। 
अवश्य पढ़े - जल्द वजन कम / Weight loss करने के आसान उपाय !
  • मसाज / Gentle Massage : पैरों को हल्का मसाज करने से लाभ मिल सकता हैं। पैरो को मसाज करते समय निचे लेटकर पैरो को ऊपर की ओर रखे और किसी व्यक्ति को पैरो के निचे से ऊपर की ओर हलके हाथों से मसाज करने को कहे। मसाज करने के लिए आप एरंडी का या सरसों का तेल उपयोग में ला सकते हैं। ध्यान रहे की मसाज करते समय अधिक बल का प्रयोग न करे। 
  • मिटटी का लेप / Mud Pack : रात को सोने से पहले अपने पैरों पर मुल्तानी मिटटी का लेप लगाकर सोए और सुबह उठने के बाद इसे धोकर निकाल दे। यह लेप सूखने के बाद Compression Stocking की तरह ही लाभ देता है और साथ में त्वचा को detoxify भी करता हैं। 
  • आदतें / Habit : शराब, धूम्रपान, गुटखा या तम्बाखू जैसे ख़राब आदतों से दूर रहे।  
  • आयुर्वेद / Ayurveda : Varicose Veins से राहत मिलने के लिए आप अपने आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से ब्राम्ही, जसद भस्म, चंद्रप्रभावटी, पुनर्नवादि गुग्गुल, सहचरादि कषाय, महामंजिष्ठादि कषाय, रस तैल, चंदनबला तैल इत्यादि का उपयोग कर सकते हैं। अर्जुन की छाल Varicose Veins में बेहद उपयोगी हैं। रात के समाय 200 ml दूध में स्वच्छ अर्जुन की छाल को उबाले और आधा रहने के बाद इसे छान कर पिने से 10 दिन में लाभ दिखने शुरू हो जाते हैं।  
  • योग / Yoga : Varicose Veins में Yoga करने से बेहद लाभ मिलता हैं। Varicose Veins से राहत पाने के लिए निचे दिए हुए योग करने चाहिए। योग की विधि जानने के लिए योग के नाम के ऊपर click करे। 
  1. हलासन 
  2. पवनमुक्तासन 
  3. सर्वांगासन   
  4. ताड़ासन 
  5. सूर्यनमस्कार 
  6. शवासन 
  7. भस्त्रिका प्राणायाम 
इस तरह आप ऊपर दिए हुए उपाय को अपने डॉक्टर की सलाह से अपनाकर Varicose Veins की समस्या से बच सकते है और इसके असर को भी कम कर सकते हैं।

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Varicose Veins / वैरिकोस वेंस जिसे सामान्य हिंदी भाषा में हम 'मकड़ी नस' भी कहते हैं, नसों का वह विकार है जिसमे नसे त्वचा की ऊपरी सतह पर उभरी हुई दिखाई देती हैं। ऐसे तो शरीर के किसी भी नस / Veins में यह विकार हो सकता हैं पर ज्यादातर पैरों के नसों में यह समस्या अधिक पायी जाती हैं। सूजी हुई यह नसे लाल, नीली या हरी रंग की हो सकती हैं।

कुछ लोगों के लिए Varicose Veins यह केवल एक सौन्दर्य समस्या हो सकती है तो कुछ लोगो में Varicose Veins के कारण पैरों में अत्याधिक दर्द और अलसर तैयार हो सकते हैं। कभी-कभी इनमे से bleeding होने का खतरा भी रहता हैं।

Varicose Veins के कारण, लक्षण और दुष्परिणाम से जुडी जानकारी निचे दी गयी हैं :

Causes, Symptoms and Side Effects of Varicose Veins in Hindi Language

Varicose Veins  के कारण, लक्षण और दुष्परिणाम
Causes, Symptoms and Side Effects of Varicose Veins in Hindi Language

Varicose Veins के क्या कारण हैं ?
Causes of Varicose Veins in Hindi

Varicose Veins के कारणों की जानकारी निचे दी गयी हैं :
  1. उम्र / Age : जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है हमारे नसों की लवचीकता / Elasticity कम हो जाती है जिस वजह से नसों में मौजूद valves ढीले पड़ जाते हैं। यही कारण है की पैरों से दिल के तरफ जानेवाला कुछ ऑक्सीजन रहित / deoxygenated रक्त नसों में जम जाता है जिससे नसे नीली पड़ जाती है और फूलने लगती हैं। 
  2. गर्भावस्था / Pregnancy : कुछ महिलाओं में गर्भावस्था में Varicose Veins की समस्या निर्माण हो जाती हैं। गर्भावस्था में पैरों से ऊपर की तरह बाह रहे रक्त का बहाव धीमा हो जाता हैं जिससे यह समस्या होती हैं। 
  3. आनुवंशिकता / Hereditary : अगर आपके परिवार में यह समस्या किसी को है तो आपको यह समस्या होने की आशंका अधिक हैं। 
  4. मोटापा / Obesity : मोटापे से पीड़ित व्यक्तियों में Varicose Veins की समस्या अधिक रहती हैं। 
  5. काम / Job : जो व्यक्ति लंबे समय तक खड़े रहने या बैठे रहने का काम करते हैं ऐसे लोगों में Varicose Veins होने का जोखिम अधिक रहता हैं। 
  6. व्यायाम / Exercise : ऐसे व्यक्ति जो किसी भी प्रकार का कोई व्यायाम नहीं करते हैं और आरामदायक जीवन जीते है ऐसे लोगो में Varicose Veins होने का जोखिम अधिक रहता हैं। 

Varicose Veins के लक्षण क्या हैं ?
Symptoms of Varicose Veins in Hindi 

Varicose Veins में निचे दिए हुए लक्षण नजर आते हैं :
  1. नसों में सूजन 
  2. नसों का रंग नीला / लाल या हरा पड़ना 
  3. नसों से रक्तस्त्राव होना 
  4. पैरों में सूजन 
  5. खून का जमना 
  6. खुजली आना 
  7. त्वचा का फटना 

Varicose Veins के क्या दुष्परिणाम हैं ?
Complications of Varicose Veins in Hindi 

Varicose Veins के कारण निचे दिए हुए दुष्परिणाम हो सकते हैं :
  1. जख्म / Ulcer : Varicose Veins के कारण Varicose Veins के पास बेहद पीड़ादायक जख्म निर्माण हो सकती हैं। ऐसे जख्म ठीक होने में ज्यादा समय लेते है और इनमे दर्द अधिक होता हैं। 
  2. रक्त का जमना / Blood Clot : अधिक समय तक रक्त एक जगह पर रहने से रक्त के जमने / clot होने का खतरा रहता हैं। जमे हुए रक्त का छोटा टुकड़ा टूट कर अगर ब्लड सर्कुलेशन में आ जाये तो ऐसा टुकड़ा फेफड़ो या मस्तिष्क में फंस कर जानलेवा साबित हो सकता हैं। 
  3. रक्तस्त्राव / Bleeding : Varicose Veins अधिक फूलने से फट कर रक्तस्त्राव होने का खतरा रहता हैं। 
Varicose Veins के विभिन्न दुष्परिणाम के बारे में जानकारी मिलने के बाद आपको यह ध्यान में आ गया होंगा की सामान्य सी दिखनेवाली यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती हैं। Varicose Veins से बचने के लिए और इसे ठीक करने के लिए क्या आधुनिक, आयुर्वेदिक और घरेलु उपचार किये जा सकते है यह जानने के लिए यहाँ click करे - Varicose Veins का आधुनिक, आयुर्वेदिक और घरेलु उपचार                                                

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गर्भावस्था में महिला का रक्तचाप / Blood Pressure का बढ़ जाना बेहद खतरनाक होता हैं। ऐसी महिला जिसका ब्लड प्रेशर सामान्य रहता था पर गर्भावस्था के सामान्यतः 20 हफ़्तों के बाद ब्लड प्रेशर सामान्य से अधिक बढ़ रहा हैं, ऐसी स्तिथि को मेडिकल की भाषा में Preeclampsia कहा जाता हैं। 

दुनियाभर में लाखों महिलाएं हाइपरटेंशन से परेशान है। प्रेगनेंसी के दौरान यह और भी खतरनाक होता है। इस दौरान हाई ब्लड प्रेशर की यह स्थिति Preeclampsia कहलाता है जो कि बच्चा बच्चा दोनों के लिए जानलेवा हो सकती है। Preeclampsia की स्तिथि को ठीक करना बेहद कठिन होता हैं इसलिए गर्भावस्था में नियमित जांच कर इसे शुरुआती दौर में ही उपचार कर काबू में करना आवश्यक होता हैं। 

Preeclampsia क्यों होता हैं, इसके लक्षण क्या हैं और इसका उपचार कैसे किया जाता है इसकी जानकारी निचे दी गयी हैं :


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अवश्य पढ़े : प्रेगनेंसी के बाद अपना वजन कम कैसे करे ?

Preeclampsia का कारण, लक्षण और उपचार क्या हैं ?
Causes, Symptoms and Treatment of Preeclampsia in Hindi language 

Preeclampsia का कारण क्या हैं ?Causes of Preeclampsia in Hindi

Preeclampsia का कोई ठोस कारण अभी तक किसी को पता नहीं चला हैं। विशेषज्ञों के अनुसार निचे दिए हुए महिलाओं में Preeclampsia होने की आशंका अधिक होती हैं। जैसे की :
  1. पहला गर्भ / First Pregnancy 
  2. मोटापा / Obesity 
  3. शुगर / Diabetes, उच्च रक्तचाप / Hypertension या गुर्दे की बीमारी / Kidney disease 
  4. गर्भ के दौरान धूम्रपान / Smoking 
  5. गर्भ में एक से अधिक बच्चा होना 
  6. अनुवांशिक (Hereditary) लक्षण जैसे मां या बहन को यह बीमारी हो 
  7. 20 साल से कम या 40 साल से अधिक की उम्र (Age)
  8. दो प्रेगनेंसी के बिच दो साल से कम अंतर या 10 साल से अधिक अंतराल रहना 

Preeclampsia के लक्षण क्या हैं ?Signs and Symptoms of Preeclampsia in Hindi 

Preeclampsia में निचे दिए हुए लक्षण नजर आते हैं :
  1. सिर में दर्द 
  2. पेट के ऊपरी हिस्से में दाई दर्द होना 
  3. देखने में परेशानी व धुंधलापन 
  4. चेहरे और हाथ पैर में सूजन होना 
  5. उल्टी 
  6. चक्कर आना 
  7. तेजी से वजन का बढ़ना 
  8. पेशाब कम होना 
  9. कभी-कभी दौरे भी पड़ने लगते हैं जिसे Eclampsia कहते हैं। 
  10. कुछ मरीजों में कोई लक्षण नहीं दिखता है। जब मरीज की हालत खराब होने लगती है तो जांच के बाद ही पता चलता है। 
  11. आपका ब्लड प्रेशर 140/90 या इससे अधिक रहना 
  12. पेशाब जांच में प्रोटीन आना 
  13. रक्त परिक्षण में प्लेटलेट्स की मात्रा कम आना 
  14. फफड़ों में पानी भर जाने से सांस लेने में दिक्कत  होना 
अवश्य पढ़े : प्रेगनेंसी में जी मचलाना और उलटी की समस्या का उपचार और घरेलू उपाय !

Preeclampsia में महिला क्या ख्याल रखे ?Preeclampsia care tips in Hindi

  • गर्भधारणा के दौरान रक्तचाप की नियमित जांच कराएं। अगर ब्लड प्रेशर की शिकायत है तो फिजिसियन की सलाह पर नियमित दवा लें। 
  • नमक का कम इस्तेमाल करें। 
  • नियमित रूप से व्यायाम करें। 
  • धुम्रपान या शराब का सेवन बिल्कुल ना करें। 

Preeclampsia से क्या समस्या निर्माण हो सकती हैं ?Complications of Preeclampsia in Hindi

  • प्लेसेंटा को कम खुन पहुंचता है जिससे गर्भस्थ शिशु का विकास धीमा होता है। 
  • प्लेसेंटा को नुकसान हो सकता है। 
  • मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो सकता है। 
  • जन्म के समय बच्चों का वजन बहुत कम होता है। 
  • बच्चा जन्मजात विकृतियों का शिकार हो सकता है। 
  • गर्भावस्था में अत्याधिक रक्तस्त्राव हो सकता है। 
  • गर्भवती को दौरा पड़ सकता है। 

Preeclampsia का उपचार कैसे किया जाता हैं ?Treatment and Home Remedies of Preeclampsia in Hindi Language

Preeclampsia के उपचार की जानकारी निचे दी गयी हैं :
  1. Preeclampsia का सबसे बेहतर उपचार है डिलीवरी कराना। अगर गर्भावस्था के 36 हफ़्तों से अधिक हुए है तो डॉक्टर दवा देकर प्रसव / Delivery कराते है या फिर cesarean ऑपरेशन करवाते हैं। 
  2. अगर डिलीवरी में अभी समय है और बच्चा पूरी तरह विकसित नहीं है तो डॉक्टर दवा देकर Preeclampsia को नियंत्रण में रखने की कोशिश करते हैं। Preeclampsia से पीड़ित महिला को निचे दी हुई सुचना / उपचार दीया जाता हैं :
  • आराम / Rest : महिला को घर या हॉस्पिटल में आराम करना चाहिए। सोते समय बाये करवट (left side) पर सोना चाहिए। 
  • बार-बार थोड़े अंतराल से बच्चे के heart sounds और पेट की सोनोग्राफी की जांच करानी चाहिए।
  • रक्त और पेशाब की जांच नियमित समय पर करनी चाहिए। 
  • ब्लड प्रेशर को नियंत्रण में रखने के लिए नियमित दवा लेनी चाहिए। 
  • दौरे न आये इसके लिए डॉक्टर की सलाहनुसार दवा लेना चाहिए। 
  • बच्चे के फेफड़े / Lungs जल्द पूर्ण विकसित हो इसके लिए विशेष इंजेक्शन लेना चाहिए। 
  • खाने में नमक का इस्तेमाल मर्यादित रखे। अधिक नमक वाली चीजे जैसे पापड़, अचार, नमकीन, चिप्स जैसे आहार कम रखे। 
  • डॉक्टर की सलाहनुसार मर्यादित मात्रा में पानी पिए। 
  • ब्लड प्रेशर का रिकॉर्ड रखे।   
अवश्य पढ़े : कैसा होना चाहिए गर्भवती महिला का आहार ?

गर्भावस्था हर महिला के जीवन का एक बेहद मुशिकल और महत्वपूर्ण पड़ाव होता हैं। आपकी गर्भावस्था में कोई दिक्कत न हो इसलिए जरुरी है की अपनी प्रेगनेंसी पहले से डॉक्टर की सलाह से चेकअप कर प्लान करे और पप्रेग्नेंट होने पर डॉक्टर की सलाह से नियमित अपना चेकअप कराये और अपने आहार-विहार का ख्याल रखे।

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क्या आपका बच्चा सिखने में पीछे रहता हैं ? क्या आपका बच्चा पढाई और खेल-कूद में धीमा हैं ? क्या उसे कोई बात समझने में अधिक समय लगता हैं ? अगर हां ! तो आजका यह लेख विशेष आपके लिए हैं। आपके बच्चे में यह समस्या क्यों है और इसे कैसे दूर करे इसकी जानकारी आज हम इस लेख में दे रहे हैं।  

आपने अक्सर देखा होंगा की कुछ बच्चे बाकि बच्चों की तुलना में पढाई या खेल में थोड़े धीमे होते है या उन्हें बातों को समझने में अधिक समय लगता हैं। ऐसे बच्चे न तो अधिक चंचल होते है और नाही अधिक बोलते हैं। 'तारे जमीं पर' फिल्म अगर आपने देखी होंगी तो आप समझ रहे होंगे की हम आज बच्चों से जुडी किस बिमारी की बात कर रहे हैं।  

कुछ बच्चों में एक मानसिक समस्या होती है जिससे बच्चे पढाई और खेलकूद में धीमे रहते हैं। मेडिकल भाषा में इस समस्या को लर्निंग डिसेबिलिटी / Learning Disability कहा जाता हैं। ज्यादातर माता पिता को पता ही नहीं चलता कि उनके बच्चे में लर्निंग डिसेबिलिटी की समस्या है। जबकि लर्निंग डिसएबिलिटी के शिकार बच्चों को जरूरत होती है तो केवल पैरेंट्स और उनके प्यार की। यदि माता-पिता धैर्य और समझदारी से काम ले तो काफी हद तक ऐसे बच्चों की समस्या को कंट्रोल किया जा सकता है। 

लगभग 30 फ़ीसदी बच्चे इस समस्या से पीड़ित होते हैं। बच्चे द्वारा बार-बार एक ही गलती दोहराई जाने पर माता-पिता अक्सर उसे बच्चे की लापरवाही समझ लेते हैं और बेवजह बच्चे को मारना पीटना शुरू कर देते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि उनका बच्चा लर्निंग डिसेबिलिटी से ग्रस्त हो सकता है। 

डॉक्टर के मुताबिक लर्निंग डिसेबिलिटी से ग्रस्त बच्चा अवसर मिलने पर ही वे अपनी क्षमता को बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं। लर्निंग डिसेबिलिटी का मतलब मतिमंद होना नहीं हैं। लर्निंग डिसेबिलिटी क्या है, इसके कारण क्या हैं, इसके लक्षण क्या हैं और ऐसे बच्चों को खेलकूद और पढाई में आगे बढ़ाने के लिए किन बातों का ख्याल रखना चाहिए इसकी जानकारी निचे दी गयी हैं :

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बच्चों में लर्निंग डिसेबिलिटी के लक्षण क्या होते हैं ?
Symptoms of Learning Disability in Kids in Hindi

बच्चों में निम्न लक्षण नजर आए तो समझ जाए वह लर्निंग डिसेबिलिटी का शिकार है। जैसे की :
  • अगर बच्चा देर से बोलना शुरू करें। 
  • साइड, शेप या कलर को पहचानने में गलती करें। 
  • आपके द्वारा बताए हुए निर्देशों को याद रखने मैं उसे कठिनाई महसूस होती हो। 
  • उच्चारण में गलती, लिखने में गलती करें।  
  • गणितीय संख्या से संबंधित नंबर ना पहचान पाए। 
  • बटन लगाने या शू लेस बाँध पाने में उसे दिक्कत होती हो। 

बच्चों में लर्निंग डिसेबिलिटी का क्या कारण है ?
Causes of Learning Disability in Kids in Hindi

लर्निंग डिसेबिलिटी यह एक जेनेटिक प्रॉब्लम है। अगर माता-पिता में से किसी एक को यह समस्या है तो बच्चों में इसके होने की आशंका अधिक होती है। बच्चे के जन्म के समय सिर पर चोट लगने या घाव होने के कारण भी लर्निंग डिसएबिलिटी हो सकती है। मस्तिष्क या तंत्रिका तंत्र / Nervous System की संरचना में गड़बड़ होने पर भी बच्चों में यह प्रॉब्लम हो सकती है। जो बच्चे प्रीमेच्योर पैदा होते हैं या जन्म के बाद जिस बच्चों में कुछ मेडिकल प्रॉब्लम होती है उनमें यहां समस्या हो सकती है। 

बच्चों में लर्निंग डिसेबिलिटी होने पर क्या करें ?
Treatment for Learning Disability in Kids in Hindi

लर्निंग डिसेबिलिटी इस बीमारी से पीड़ित बच्चों की परवरिश के लिए धैर्य की जरूरत होती है। माता-पिता को समझना चाहिए कि ऐसे बच्चों को सीखने में समय लगता है इसलिए ऐसे बच्चों के साथ में हमारा व्यवहार करें। ऐसे बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से ना करें। पैरेंट्स का तुलनात्मक व्यवहार उनमें हीन भावना पैदा कर सकता है। माता पिता को चाहिए कि वह भी हालात को स्वीकार करें बार-बार डाटने से बच्चा अपना आत्मविश्वास खो देता है और निराश हो जाता है। इसलिए उन्हें देखने के बजाए प्यार मनोहर से पेश आए उन्हें महसूस ना होने दें कि वह किसी बीमारी के शिकार है। अपना बच्चा किस चीज में या किस विषय में कमजोर है यह पता करे और उसे वह विषय प्यार से समझाए और अधिक समय दे। अपने बच्चे की प्रगति पर नजर रखे 

ऐसे बच्चों का इलाज के लिए पीडियाट्रिशियन, साइकियाट्रिस्ट, रिमेडियल एजुकेटर, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट की राय जानना जरूरी है। केवल एक डॉक्टर कि राए लेकर उपचार शुरू ना करें। सेकंड ओपिनियन हमेशा ले। उपचार के दौरान स्पेशल एजुकेटर से थेरेपी सीखे और फिर बच्चों के साथ वक्त बिताएं। बच्चो में एकाग्रता और याददाश्त बढ़ाने के लिए आप बच्चो को अनुलोम-विलोम प्राणायाम, सूर्यनमस्कार, ताड़ासन, गरुड़ासन, पश्चिमोत्तानासन, शवासन और ध्यान योग सीखा सकते हैं। 

ऐसे बच्चे को सरकार की तरफ से परीक्षाओं में छूट दी जाती है, जिससे परीक्षा में एक्स्ट्रा टाइम, एक्स्ट्रा राइटर, केलकुलेटर का इस्तेमाल, मौखिक परीक्षा देना आदि। छूट को पाने के लिए सरकारी अस्पताल का प्रमाण पत्र देना आवश्यक होता है। 

लर्निंग डिसेबिलिटी का कोई ईलाज नहीं है पर बच्चों की कमजोरी और उसके पॉजिटिव पॉइंट को ध्यान में रखकर अगर बच्चे को सही परवरिश दी जाये तो ऐसे बच्चे सामान्य बच्चों को पछाड़कर आगे बढ़ सकते हैं और कामयाबी पा सकते हैं। महँ वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन या कार्टन जगत के निर्माता वाल्ट डिज्नी भी लर्निंग डिसेबिलिटी के शिकार थे फिर भी उन्होंने दुनिया में अपना एक मुकाम हासिल किया था।

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हम सभी जानते हैं की माँ का दूध बच्चों के पोषण और रोग प्रतिकार शक्ति बढ़ाने के लिए सबसे श्रेष्ठ हैं। अध्ययनों से यह बात सिद्ध हो चुकी है की मां का दूध प्रोटीन लिपिड्स कार्बोहाइड्रेट्स तथा अन्य तत्वों का खजाना है जो किसी बच्चे के स्वास्थ्य को सुनिश्चित बनाने मैं महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। 

वास्तव में, एक हालिया अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि यदि प्रत्येक महिला लंबे समय तक अपना दूध पिलाती रहे तो वह 80 लाख जिंदगियां बचा सकती है। 

रिपोर्टों के मुताबिक, जहां एक और मां का दूध बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक होता है वहीं दूसरी और यह दूध उच्च आई क्यू लेवल से भी जुड़ा है और यह मोटापे की दर को कम करता है। समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में यह घातक संक्रमणों को तथा अन्य मेडिकल समस्याओं को रोकने में मदद करता है। यही कारण है कि डॉक्टर नवजन्मे बच्चे को पहले 6 महीने के लिए मां का दूध पिलाने की सलाह देते हैं। 

खाना खाना शुरू करने से पहले बच्चे के लिए मां के दूध के लाभ हम सबको पता है परंतु हम में से अधिकतर यह नहीं जानते कि इसका उपयोग कई अन्य तरीके से भी किया जा सकता है। आइए जानते हैं इस आचर्यजनक दूध के कुछ अन्य महत्वपूर्ण घरेलु उपयोग :

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माँ के दूध के अन्य महत्वपूर्ण उपयोग 

Useful alternative uses of Breast Milk in Hindi

माँ के दूध / Breast Milk का उपयोग बच्चों के पोषण के अलावा और कहाँ किया जा सकता है इसकी जानकारी निचे दी गयी हैं :
  1. डायपर रैश / Diaper Rash : बच्चे को पोषण देने के साथ-साथ मां का दूध कई अन्य समस्याओं को सुलझाने में भी सक्षम है। उदाहरण के लिए इससे डायपर रैश का बेहतर इलाज किया जा सकता है। जहां रैश हो उस जगह पर थोड़ा सा मां का दूध छिड़के और इसे सूखने दे। कुछ दिनों में ही रैश की समस्या कम हो जाएगी।
  2. दांत आना / Teething : दांतों की समस्याओं के लिए भी मां का दूध बहुत बढ़िया रहता है। आप इसे क्यूब्स में फ्रिज कर सकती है। फिर इसे एक स्टरलाइज कपड़े में लपेटकर बच्चे को दे सकती है। इससे बच्चों में दांत आसानी से आते है और तकलीफ नहीं होती हैं। 
  3. कान में संक्रमण / Ear Infection : बच्चों में कान के संक्रमण का इलाज करने के लिए मां के दूध की कुछ बूंदे उसके कान में डालने से भी लाभ होता है। क्योंकि मां के दूध में एंटीसेप्टिक तथा एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं इसलिए इसका उपयोग करो जो तथा संक्रमणों का उपचार करने के लिए किया जा सकता है। 
  4. रोग प्रतिकार शक्ति / Immunity : ऐसे बच्चे या व्यक्ति जिनकी रोग प्रतिकार शक्ति बेहद कम है या जो बार-बार पड़ते है ऐसे लोगों में सुरक्षित रखा हुआ ब्रैस्ट मिल्क टॉनिक के तौर पर देने से उनकी रोग प्रतिकार शक्ति में इजाफा होता हैं। इसी तरह गे का दूध Colostrum भी उपयोगी माना जाता हैं। कैंसर से पीड़ित रोगियों में भी इससे लाभ मिलता हैं। 
  5. गला ख़राब / Sore Throat : गला ख़राब होने पर ब्रैस्ट मिल्क से गरारे करने से जल्द लाभ मिलता हैं। 
  6. त्वचा / Skin : सनबर्न से पीड़ित त्वचा पर थोड़ा सा मां का दूध डालें तो परेशानी से थोड़ी राहत मिल सकती है। कई अभियानों में यह कहा गया है कि मां का दूध केमिकल लुब्रिकेंट्स का एक प्राकृतिक विकल्प है क्योंकि केमिकल नलुब्रिकेंट्स से संवेदनशील त्वचा पर समस्या हो सकती है। 
  7. जख्म / Wound : कीड़े के काटने पर भी आराम के लिए आप इसका उपयोग कर सकती है। इसका प्रयोग जख्म को साफ करने के लिए भी किया जा सकता है। 
  8. आहार / Diet : मां के दूध का उपयोग विभिन्न में रेसिपी मैं भी किया जा सकता है। अध्ययनों से यह पता चला है कि इसमें ऐसे तत्व मौजूद है जिनमें विभिन्न प्रकार की कैंसर कोशिकाओं के विकास को रोकने की क्षमता है। 
  9. मुंहासे / Acne : मां के दूध तथा नारियल तेल के मिश्रण से कील मुहांसे दूर किए जा सकते हैं। 
  10. सौंदर्य प्रसाधन / Make up : इसका उपयोग मेकअप हटाने के लिए तथा फटे होठों की समस्या को दूर करने के लिए किया जा सकता है। वास्तव में ब्रेस्ट मिल्क फेशियल एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका उपयोग पश्चिम में काफी लोकप्रिय है। विशेषज्ञों के अनुसार इसमें मौजूद कैसी नामक प्रोटीन कोशिकाओं को समृद्ध बनाता है और त्वचा को चमकदार बनाने में सहायता करता है। 
Breast Milk या माँ के दूध का इस्तेमाल इस तरह हम कई तरह से उपयोग कर इसका लाभ उठा सकते है परंतु ध्यान रहे की इसका उपयोग अपने डॉक्टर की सलाह लेकर भी करे। माँ का दूध ताजा या मिल्क बैंक से लिया है तो ही करे अन्यतः इसमें बैक्टीरिया भी हो सकता हैं। 

अगर कुछ माताओं को अतिरिक्त दूध आता है जो बच जाता है तो इसे आप मिल्क बैंक में दान कर सकते है जहाँ से इसे किसी जरूरतमंद व्यक्ति के लिए उपयोग में लिया जा सकता हैं। 

Image Source : http://www.safebee.com/health/shared-breast-milk-before-latch-on-idea-get-facts
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आजकल फैशन के तौर पर महिलाओं में ऊँची हील / High heel के सैंडल पहनना आम हो गया है। कई महिलाएं अपनी हाइट बढ़ाने के लिए ऊँची हील्स का सहारा लेती है। बाजार में भी कई तरह के डिजाईन और रंगों में हाई हील्स के जूते-सैंडल्स मिलते है जो की महिलाओंको अपनी और आकर्षित करते है। 

ऊँची हील्स पहनना आजकल स्टाइल हो गया है और कई महिलाएं ऊँची हील्स पहनने पर अपने आप में आत्मविश्वास पाती है। देखा जाये तो हाई हील सैंडल में खूबसूरत लुक के अलावा इसका कोई और फायदा नही है; बल्कि सेहत के लिए इसके नुकसान काफी है।

विभिन्न अध्ययनों के आधार पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि लगातार हिल्स पहनने से हमारे टखने की ताकत और पैरों का संतुलन प्रभावित होता है। आज इस लेख में हम ऊंची एडी के सेंडल पहनने से होने वाले दुष्प्रभाव के बारे में जानकारी दे रहे हैं। 

ऊँची एड़ी / High heel के सैंडल पहनने के क्या दुष्परिणाम है और इससे कैसे बचा जाये इसकी अधिक जानकारी निचे दी गयी हैं :

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ऊँची एड़ी के सैंडल पहनने के क्या दुष्परिणाम है ?
Side effects of wearing High Heel Footwear in Hindi Language

हाई हील्स में लगभग 3 प्रकार की ऊँचाई होती है। करीब 75% उची एड़ी की सैंडल में 3 इंच की हील, 50 % उची एड़ी की सैंडल में 2 इंच की हील्स और 25% तक उची एड़ी की सैंडल में 1 इंच ऊंचाई होती हैं। जितनी ज्यादा ऊँची हिल होती है पैरों के आगे के हिस्से पर उतना ही अधिक भार पड़ता है। हील्स पहनना थोड़ी देर के लिए तो अच्छा लगता है पर बाद मे उससे थकान और दर्द जैसी समस्याएं बढ़ने लगती है।

उची एड़ी की सैंडल पहनने के दुष्परिणाम इस प्रकार हैं : 
  1. शरीर आकार में गड़बड़ी : हाय हील पहले ने से आपके कमर, कुल्ले , कंधे पर रीढ़ का पूरा भार आ जाता है।  इसे शरीर का पूरा पोश्यर बिगड़ जाता है।  अगर यह स्थिति लंबे समय तक रही तो कमर और पैरों में गंभीर दर्द भी हो सकता है। 
  2. रीढ़ की हड्डी पर असर : ऊँची हील्स से रीढ़ की प्राकृतिक संरचना सही नही रह पाती, जिस वजह से कमर में दर्द, चलने में पोस्चर में  बदलाव हो सकते है। 
  3. बारबार और आसानी से चोट आने का डर : बुजुर्ग या अधिक वजन वाली महिलाओं में शरीर का संतुलन बिगड़ कर गिरने का खतरा बढ़ जाता है और ऐसे में फ्रैक्चर, टखने में चोट या मोंच भी आ सकती है। 
  4. शारीरिक वजन अधिक होने पर : अगर आप ओवरवेट है और हाई हील्स पहनती है तो आपके एड़ियों पर दबाव बढ़ ज्याता है, जिससे दर्द होता है। 
  5. अँगुलियों पर जोर : जब आपका पूरा वजन पैरों के बीच की मुख्य 3 अंगुलियों पर पड़ता है तो पैरों की उंगलियो में दर्द और सूजन की समस्या हो सकती है। वृद्धों को यह परेशानी ज्यादा हो सकती है। ऊँची हील्स वाली सैंडल्स अत्यंत असुविधाजनक होने से अंगूठे पर सूजन भी आ सकती है। 
  6. घुटनों का दर्द : हाई हील्स से घुटनों पर लगभग 26 प्रतिशत दबाव बढ़ जाता है, जिससे घुटनों में दर्द और आर्थराइटिस जैसी समस्याएं बढ़ने लगती है। 
  7. पिंडलियाँ : पिंडलियों की मांसपेशियों पर अधिक दबाव होने से वे सख्त हो जाती है, जिससे पिंडलियों में , कमर में दर्द रहता है। इससे आगे चलकर Varicose Veins की समस्या भी हो सकती है। 
  8. एकिलीज़ टेंडन (Achilles Tendon) : एकिलीज़ टेंडन याने  पिंडलियों से एडी तक के नसों का जाल छोटा होकर एड़ियां दर्द करना शुरू कर देती है। यही स्तिथि बनी रहे तो नसे हमेशा के लिए छोटी हो जाती है। जिससे पैरों के रक्तसंचरण पर भी असर होता है। 
  9. पंप बम्प : हाई हील की स्ट्रेप जब बार बार एड़ी की हड्डी पर रगड़ करती है तो वहां की हड्डी बढ़ जाती है जिससे असहनीय दर्द होता है , इसे पंप बम्प की समस्या कहते है। 
  10. कॉर्न आदि की समस्या : अच्छे फिटिंग की हाई हील्स न पहनने से अंगुलियों को मोड़ना पड़ता है जिससे वे छिल सकती है या बार बार कॉर्न की समस्या भी हो सकती है। 
  11. बच्चियों के लिए खतरा : पैरों का विकास करीब 12 वर्ष तक होता है । अगर इससे कम उम्र में हाई हील्स पहनते हैं तो पैरों का विकास अवरुद्ध हो जाता है। हड्डियों में दर्द और टेढ़ापन भी आ सकता है। 

सैंडल चुनने में ध्यान रखने योग्य कुछ बाते How to select footwear for females in Hindi

  1. फुटवियर में गौर करने वाली बात है कि फुटवियर की लम्बाई एक से सव्वा सेंटीमीटर होनी चाहिए। 
  2. हाय हील्स के अलावा फ्लैट स्लीपर भी नहीं पहननी चाहिए वरना शरीर का सारा भार एडियो पर आ जाता है। 
  3. स्पोर्ट्स शूज भी बेहतर कोचिंग वाले सही माने जाते हैं।
  4. जब हम साधारण चप्पल पहनते हैं तो प्राकृतिक रूप से चल पाते है। 
  5. प्लेटफार्म हील्स पैरों के लिए बेहतर साबित होते है।

हाई हील्स पहनते वक्त ये सावधानी रखें Things to remember while wearing High heel Sandals in Hindi

  • एयरहोस्टेस  या रिसेप्शनिस्ट जैसे विभिन्न पेशों में महिलाओं को हिल पहननी पड़ती है। ऐसे में बीच-बीच में समय मिलने पर इसको उतार कर थोड़ी देर के लिए पैरों को आराम दिया जाना चाहिए। ध्यान रखे कि आप एक घंटे से ज्यादा समय तक लगातार चलने, खड़े होकर काम करने से बचना चाहिए। 
  • यदि हील्स पहनने पर आपको बार-बार मोच आ जाती हो या पैर में किसी तरह का कोई समस्या हो तो स्पोर्ट्स शूज या जूते पहने। 
  • जब आप जुते ले तो उनके अंदरूनी सोल या कुशन्स सॉफ्ट ले। पुरे जूतों को आरामदायक बनाने के लिए इनमे सिलिकॉन मेटाटर्सल पैड्स डाले, जिससे झटखों को सोखने में मदत मिलेगी। ये एक प्रकार के अंडाकार पैड्स होते है , जो पैरों के नीचें के गोलाकार हिस्सों में बैठते हैं। इससे आपके पैर संतुलित रहते है और उँगलियों का घर्षण भी कम होता है, जिससे फोड़े , फुंसी से भी राहत मिलती है। 
  • सही हील्स वह होती है, जिसे पहनने के बाद आप शरीर को खासकर सीर और रीढ़ की हड्डी को सीधा रख सके। 
  • चलते वक्त छोटे छोटे कदम ले। 
  • कोशिश करे की हाई हील्स तभी पहने जब आपको ज्यादा चलना या खड़ा होना न पड़े। ऊँची हील्स का प्रयोग कामकाज के दौरान, विशेष त्यौहार, पार्टीज आदि में ही करे जब ज्यादा जरूरत हो। 
  • योग, स्ट्रेचिंग या पैरों का व्यायाम अवश्य करे, जिससे पैरों में रक्तसंचालन सही हो और दर्द से भी राहत मिले। 
  • हर रोज रात को गर्म पानी में नमक डालकर पैरों को 10 से 15 मिनिट सेंक दे ताकि पैरों को आराम मिले और पैर की त्वचा भी सही रहे। 
  • पैरों को मुलायम और मजबूत रखने के लिए जैतून, तील या सरसों के तेल से पैरों की मालिश करें। 
इस तरह हाई हील्स ना पहनकर या कम से कम पहनकर आप अपने पैरों को अतिरिक्त तनाव से बचा सकते है और उपर्युक्त तरीकों को आजमाकर अपने पैरों की सुरक्षा कर सकते है। 

Image courtesy of Sira Anamwong at FreeDigitalPhotos.net
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