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Fibroid / फाइब्रॉएड जिसे हिंदी में रसौली भी कहते हैं महिलाओं में पायी जानेवाली एक आम स्वास्थ्य समस्या हैं। एक समय ऐसा था जब फाइब्रॉएड के उपचार के लिए सम्पूर्ण गर्भाशय निकालना (Hystrectomy) यह एक ही उपचार हुआ करता था पर अब समय के साथ Fibroid का उपचार करना बेहद आसान और सुरक्षित बन चूका हैं। 

Fibroid का आधुनिक उपचार के साथ आप कुछ उपयोगी घरेलु नुस्खे, आयुर्वेदिक उपचार और Yoga का सहारा भी ले सकते हैं। इनसे Fibroid का आकार नहीं बढ़ता हैं और Fibroid को सिकुड़ने में सहायता भी होती हैं। Fibroid का आधुनिक उपचार, आयुर्वेदिक उपाय, घरेलु नुस्खे और योग से जुडी जानकारी आज इस लेख में हम आपको देने जा रहे हैं। 

Click करे और अवश्य पढ़े - Fibroid का कारण, लक्षण, प्रकार और निदान से जुडी सारी जानकारी 

फाइब्रॉएड का आधुनिक उपचार, आयुर्वेदिक उपाय, घरेलु नुस्खे और योग से जुडी अधिक जानकारी निचे दी गयी हैं :
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Fibroid का उपचार कैसे किया जाता हैं ?

Fibroid Treatment in Hindi 

कुछ फाइब्रॉएड इतने छोटे होते है की उनके वजह से महिला को कोई तकलीफ नहीं होती और ऐसे छोटे फाइब्रॉएड का उपचार करने की आवश्यकता नहीं होती हैं। फाइब्रॉएड का उपचार दो प्रकार से किया जा सकता हैं। जो फाइब्रॉएड दवा से ठीक हो सकते है उन्हें दवा देकर ठीक किया जाता है और अन्य प्रकार के बड़े फाइब्रॉएड को ऑपरेशन कर निकाला जाता हैं। 
  1. दवा / Medicine : फाइब्रॉएड का उपचार करने के लिए डॉक्टर की सलाह से नियमित दवाई लेनी चाहिए। जो युवतियां गर्भवती होना चाहती है उनमे फाइब्राइड के साइज को कम करने के लिए हारमोंस की इंजेक्शन भी दिए जाते हैं। फाइब्रॉएड को सिकोड़ने के लिए हार्मोनल दवा दी जाती है जिनसे महिला के शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन का प्रमाण नियंत्रित होता हैं। इसके साथ ही रोगी के जरूरत के अनुसार दर्दनाशक दवा और खून कम होने की स्तिथि में खून बढ़ाने की दवा भी दी जाती हैं। 
  2. ऑपरेशन / Surgery : अब नए इलाज आ गए हैं जिनमें गर्भाशय के साथ छेड़छाड़ किए बिना फाइब्राइड को निकाला जा सकता है। इस उपचार में मायो लाइसेस, laser removal, मायोमेक्टमी, surgical removal, uterine artery embolization जिसमे इंजेक्शन धमनियों में दिया जाता है और फाइब्राइड में होने वाली ब्लड सप्लाई को काट दिया जाता है। 
  3. बिना सर्जरी वाले ट्रीटमेंट : इनमें रेडियो फ्रीक्वेंसी एप्लीकेशन में हीट एनर्जी का इस्तेमाल करके गांठ को नष्ट कर देते हैं। दूसरे ट्रीटमेंट में एम आर आई की मदद से अल्ट्रासाउंड सर्जरी की जाती है जो है फाइब्रॉएड को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देती है। 
समय के साथ फाइब्रॉएड के उपचार अधिक सुरक्षित और आसान हो गए हैं। फाइब्रॉएड का आकार और मरीज के जरुरत के अनुसार कौनसा उपचार उपयुक्त रहेगा यह डॉक्टर तय करते हैं। 

फाइब्राइड का आयुर्वेदिक घरेलू उपचार 

Ayurveda and Home remedies in Hindi

फाइब्राइड को प्राकृतिक रूप से ठीक करने के लिए ऐसे हमें अपने आहार में ऐसे आहार पदार्थों का सेवन करना चाहिए जो एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन होरमोंस को नियंत्रित रखे और फाइब्राइड को सिकोड़ दे। फाइब्राइड को ख़त्म करने के लिए हमें अपने आहार में इन घरेलु आयुर्वेदिक औषधि और आहार का सेवन करना चाहिए। 
  1. ब्रोकली / Broccoli : ब्रोकली हरे रंग की फाइबर से भरी हुई एक पौष्टिक आयुर्वेदिक औषधि है। ब्रोकोली में मौजूद एंजाइम फाइब्राइड को सिकोड़ने में मदद करते हैं। 
  2. बादाम / Almond : बादाम में प्रचुर मात्रा में ओमेगा 3 फैटी एसिड होते हैं जो कि यूटरस की लाइनिंग को ठीक करते हैं। फाइब्रॉएड ज्यादातर गर्भाशय की लाइनिंग पर ही होते हैं। 
  3. हल्दी / Turmeric : हल्दी एक बेहतरीन आयुर्वेदिक औषधि हैं। हल्दी पेट दर्द कम करने के साथ-साथ फाइब्राइड की सुजन भी कम कर देती हैं।
  4. प्याज / Onion : प्याज में प्रचुर मात्रा में सेलेनियम होता है जिससे मांसपेशिया मजबूत होती है। प्याज फाइब्राइड के आकारको बढ़ने से रोकता हैं।  
  5. लहसुन / Garlic : कच्ची लहसुन एक बहुउपयोगी आयुर्वेदिक औषधि हैं। इसमें एंटी इंफ्लेमेटरी गुण है जो किसी भी सुजन को कम करती हैं। 
  6. ग्रीन टी : रोजाना ग्रीन टी का सेवन सुबह शाम करने से फाइब्राइड होने का खतरा कम हो जाता हैं। इसमें अधिक मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट होते है जो फाइब्राइड का साइज़ कम करते हैं। 
  7. आंवला : रोजाना सुबह एक चमच्च आंवला पाउडर एक चमच्च शहद के साथ लेने से फाइब्राइड का आकार कम होने लगता हैं। 
  8. कच्ची सब्जियां : कच्ची या उबाली हुई सब्जिया फाइब्राइड का आकार कम करती हैं। इनसे महिलाओं के शरीर में हॉर्मोन नियंत्रण में रहते हैं। 
  9. दूध : अमेरिका में हुए एक संशोधन में यह बात पता चला है की रोजाना अपने आहार में दूध या दूध से बने पदार्थ का सेवन करने वाली महिलाओं में फाइब्राइड का खतरा 30 % तक कम रहता हैं। ऐसा दूध में मौजूद कैल्शियम के कारण हो सकता हैं। 
  10. आयुर्वेदिक उपचार : फाइब्राइड का उपचार करने के लिए चंद्रप्रभा वटी, कांचनार गुग्गुल, प्रदांत्रक चूर्ण, अश्वगंधा, ब्राम्ही, शतावरी, नीम, अशोक, मंजिष्ठा आदि आयुर्वेदिक औषधि का उपयोग किया जाता हैं। इसके साथ ही रोगी की प्रकृति और कुपित दोष के हिसाब से पंचकर्म उपचार भी किया जाता हैं। 


फाइब्राइड में कौन सा योग करे ? Yoga to cure Fibroid in Hindi 

योग भगाये रोग यह कहावत तो हम सभी जानते हैं। रोजाना योग और प्राणायाम करने से हमारा शरीर स्वस्थ रहता हैं, हॉर्मोन्स नियंत्रित  वजन भी सामान्य सामान्य रहता हैं। फाइब्राइड से छुटकारा पाने के लिए अपने निचे दिए हुए योग करना चाहिए :
  1. कपालभाती 
  2. अनुलोम विलोम 
  3. उज्जयी 
  4. सूर्यनमस्कार 
  5. भारद्वाजासन 
  6. सेतुबंधासन 
  7. सुप्तवीरासन 
  8. जनुशिर्शासन 
  9. वज्रासन 
  10. पश्चिमोत्तानासन 
इन सभी योग की जानकारी आप यह click कर पढ़ सकते हैं - सम्पूर्ण योग की जानकारी 
फाइब्राइड यह महिलाओं में होनेवाली एक आम समस्या है। समय पर उपचार और एहतियात बरतकर आप इससे होनेवाले दुष्परिणाम से बच सकते हैं। 
आशा है आपको यह फाइब्राइड के उपचार, घरेलु आयुर्वेदिक उपाय और योग उपचार की जानकारी उपयोगी लगी होगी और इसे आप शेयर भी करेंगे !

30 वर्ष की आयु के बाद से ही महिलाओं में गर्भाशय के फाइब्रॉएड / Fibroid की समस्या देखि जा सकती हैं।सामान्य भाषा में फाइब्रॉएड को रसौली भी कहा जाता हैं। 30 वर्ष के ऊपर की आयु के लगभग 50% महिलाओं में गर्भाशय के Fibroid की समस्या पाई जाती है। 

लगभग 99% गर्भाशय के फाइब्रॉएड की समस्या सामान्य होती है और 1% फाइब्रॉएड ही कैंसर होता है। फाइब्राइड के ज्यादातर मामलों में कोई लक्षण दिखाई नहीं देता है और इसी वजह से यह स्थिति खतरनाक साबित हो सकती है। Fibroid का समय पर उपचार करने से इस से होने वाले दुष्परिणाम से बचा जा सकता है। 

गर्भाशय के Fibroid के कारण, लक्षण, प्रकार और निदान से जुडी अधिक जानकारी निचे दी गयी हैं :
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गर्भाशय के फाइब्रॉएड का कारण, लक्षण और प्रकार  

Causes, Symptoms and Types of Fibroid in Hindi

फाइब्रॉएड किसे कहते हैं ? What is Fibroid in Hindi

Uterus या गर्भाशय के अंदर बनने वाली मांसपेशियों के गाँठ / Tumor को Fibroid कहते हैं। यह अंगूर के आकार के हो सकते हैं। यह एक से अनेक भी हो सकते हैं। भारत में प्रतिवर्ष इसके एक करोड़ से अधिक मामले नजर आते हैं। 

फाइब्रॉएड के क्या कारण हैं ? Causes of Fibroid in Hindi

फाइब्रॉएड होने के कुछ मुख्य कारण इस प्रकार हैं :
  1. शारीरिक संबंध न रखना : भारतीय चिकित्सकों के अनुसार फाइब्रॉएड उन महिलाओं को होने की संभावना अधिक होती है जो लंबे समय तक शारीरिक संबंध नहीं बनाती है। 
  2. अविवाहित : फाइब्राइड की समस्या उन महिलाओं में भी अधिक होती है जो बड़ी उम्र तक अविवाहित रहती है। अधिक समय तक शरीर की भितरी जरूरतों को पूरा ना करने पर फाइब्राइड की समस्या जन्म लेती है। 
  3. गर्भावस्था : जो महिलाएं लंबे समय तक गर्भवती नहीं होती उनके गर्भाशय में इस तरह की गांठे बनने लगती है। 
  4. आयु : प्रजनन काल में महिलाओं में फाइब्रॉएड की समस्या पायी जाती हैं।  रजोनिवृत्ति / Menopause के बाद गर्भाशय अपने आप सिकुड़ने लगता है और Fibroid की समस्या नहीं होती हैं। 
  5. अनुवांशिकता : अगर आपके परिवार में फाइब्रॉएड का इतिहास है तो आपको यह समस्या होने का खतरा अधिक रहता हैं। 
  6. हारमोंस : महिला के शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हॉर्मोन की अधिकता के कारण Fibroid बनने का खतरा बढ़ जाता हैं। 
  7. मोटापा : सामान्य वजनवाली महिलाओं के तुलना में फाइब्रॉएड की समस्या अधिक वजनवाली (मोटापे से पीड़ित) महिलाओं में अधिक देखि जाती हैं। 
  8. जीवनशैली : इसका सबसे बड़ा कारण बदलती अनियमित जीवनशैली और तनाव भी है।

फाइब्रॉएड के लक्षण क्या है ? Symptoms of Fibroid in Hindi


गर्भाशय का फाइब्रॉएड होने पर निचे दिए हुए लक्षण नजर आते हैं :
  1. सामान्य से अधिक मासिक आना 
  2. मासिक के समय पेट में दर्द अधिक होना 
  3. कमर के निचले हिस्से में दर्द 
  4. शारीरिक सम्बन्ध बनाने वक्त दर्द होना 
  5. लंबे समय तक मासिक धर्म चलना 
  6. पेशाब में जलन होना या बार-बार पेशाब जाना 
कुछ मामलों में कोई लक्षण नजर नहीं आता ऐसे में मामला गंभीर भी हो सकता है।

फाइब्रॉएड के कितने प्रकार हैं ? Types of Fibroid in Hindi

फाइब्रॉएड के मुख्य 3 प्रकार हैं :
  1. सबम्युकोसल फाइब्रॉएड : गर्भाशय में गर्भाशय के लाइनिंग से कैविटी में होनेवाले यह फाइब्रॉएड लम्बे समय तक रहते है और इनमे रक्तस्त्राव भी अधिक होता हैं। 
  2. सबसरोसल फाइब्रॉएड : गया फाइब्रॉएड र्भाशय के बाहर की ओर होते हैं। इनके कारण पेशाब की थैली, गुदा / anus या स्पाइन पर भी दबाव आ सकता हैं। यह काफी भारी होते हैं। 
  3. इंट्राम्यूरल फाइब्रॉएड : यह फाइब्रॉएड गर्भाशय के स्नायु की दीवार पर बनते हैं। इनका आकार बड़ा होता है जिससे मासिक अधिक समय तक रहता है और दर्द भी अधिक होता हैं। 

फाइब्रॉएड का निदान कैसे किया जाता है ?

महिला में फाइब्राइड से जुड़े लक्षण पाए जाने पर डॉक्टर इसकी पुष्टि करने के लिए पेट की Sonography और MRI कराने की सलाह देते हैं। सोनोग्राफी और एम आर आई में गर्भाशय की फाइब्राइड की पुष्टि हो जाती है।

Fibroid का निदान हो जाने पर इसके आकार, महिला की आयु और तकलीफ को देखकर क्या उपचार करना चाहिए यह डॉक्टर तय करते हैं। कुछ Fibroid ऐसे होते है जो दवा से ठीक हो जाते है और कुछ Fibroid को ऑपरेशन कर निकालना पड़ता हैं। Fibroid के उपचार से जुडी अधिक जानकारी आप यहाँ click कर पढ़ सकते हैं - Fibroid का उपचार, घरेलु आयुर्वेदिक उपाय और योग 

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प्रेगनेंसी के पुरे 9 महीने इंतजार करने के बाद जब शिशु पहली बार इस दुनिया में आता है तो सभी को बेहद ख़ुशी होती हैं। इस ख़ुशी के साथ नयी माताओं को यह चिंता भी होती है की क्या वह अपने शिशु को ठीक से स्तनपान / Breast feeding करा पाएंगी।   


जन्म के बाद पहले 6 महीने तक शिशु का सारा पोषण माँ के दूध पर निर्भर करता है और ऐसे में जरुरी है की माँ को बच्चे को कैसे और कब स्तनपान कराना है इसकी सम्पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। स्तनपान कराते समय क्या सावधानी बरतनी चाहिए, ऊपर का दूध कब पिलाना चाहिए और स्तनपान के समय माँ और बच्चे को होनेवाली परेशानी से कैसा बचाना चाहिए इसकी भी जानकारी माता को होना बेहद जरुरी होता हैं। 

आज इस लेख में हम स्तनपान को लेकर यह सभी जानकारी देने जा रहे है :


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नयी माताओं के लिए स्तनपान से जुडी महत्वपूर्ण जानकारी How to breastfeed information in Hindi

स्तनपान कराना क्यों जरूरी है ? 

माँ का दूध शिशु के पलने-बढ़ने के लिये जरूरी पोषक तत्वों का एक बेमिसाल मिश्रण होता है और इसमें बड़ी तादाद में रोग-प्रतिकारक तत्व होते हैं जो बीमारी से लड़ने में मदद करते हैं।
  • शरीर की बीमारी से लड़ने की ताकत को बढ़ाकर शिशु को कई तरह की बीमारियों से बचाता है।
  • जन्म देने के बाद माँ के शुरूआती दूध को ‘कोलोस्ट्रम’ / Colostrum कहा जाता है। इस दूध में रोग-प्रतिकारक और पोषक तत्वों की भरमार होती है इसलिये इसे ‘लिक्विड गोल्ड’ भी कहा जाता है और यह दूध शिशु को जरूर पिलाना चाहिये।
  • जन्म देने के 3 से 5 दिनों के बाद माँ के शरीर में बनने वाले दूध में सुधार हो जाता है और यह दूध ‘कोलोस्ट्रम’ की तुलना में ज्यादा पतला और सफेद होता है। अब इस दूध में केवल उतना ही पानी, मिठास, प्रोटीन और वसा होती है जितना शिशु की पलने-बढ़ने के जरूरी है। इसके बाद माँ के दूध में पौष्टिक तत्वों की तादाद शिशु की जरूरत के हिसाब खुद-ब-खुद घटती-बढ़ती रहती है। 
  • पाॅउडर दूध या गाय के दूध की तुलना में माँ का दूध आसानी से पचता है।

पाॅवडर दूध और माँ के दूध में क्या फर्क हैं ?

  • माँ का दूध असानी से पच जाता है जबकि पाउडर दूध पचने में समय लगता है।
  •  माँ के दूध के लिये खर्च नहीं करना पड़ता।
  • माँ के दूध में पौष्टिक तत्वों की तादाद के अनुपात की बराबरी नहीं हो सकती।
  • जांचो में पता चला है कि माँ का दूध पीने वाले शिशुओं की रोग प्रतिकारक ताकत पाउडर दूध पीने वाले शिशुओं से ज्यादा अच्छी होती है।
  • माँ का दूध शिशुओं में डायरिया, कान और सांस के संक्रमण के खतरे को कम करता है।
  • ऐसे बहुत कम मामले सामने आये हैं जहाँ माँ का दूध पीने वाले बच्चों में लम्बे समय के बाद भी टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज़, मोटापा, दमा, दिल की बीमारी और एलर्जी जैसी परेशानियां हुई हों।
  • स्तनपान कराने में कम मेहनत लगती है क्योंकि इसमें दूध बनाने, हाथ धोने, बोतल या बर्तन को कीटाणु मुक्त करने जैसे काम नहीं करने पड़ते।
  • रात के समय, शिशु को लगातार दूध पिलाने के बाद भी, माताओं को ज्यादा आराम मिलता है क्योंकि इसके लिये उन्हें बार-बार रसोई में नहीं जाना पड़ता जैसा पाउडर दूध बनाने के लिये किया जाता है।
  • माँ का दूध पीने से शिशु और माँ के बीच अपनापन बढ़ता है और इससे उनके रिश्ते को जो मज़बूती मिलती है उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। पाउडर दूध के मामले में ऐसा नहीं होता।
  • शिशु को स्तनपान कराना माताओं के लिये भी बहुत फायदेमंद होता है। हालांकि, इसमें समय लगता है पर स्तनपान कराना, गर्भावस्था के दौरान बढ़े हुये वजन को कम करने का यकीनी तरीका है।
  • स्तनपान कराने वाली महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज, स्तन और आॅवेरिअन कैंसर होने की संभावन भी कम होती है।
  • स्तनपान कराना नई माताओं को प्रसव के बाद होने वाले अवसाद से निपटने और प्रसव में ज्यादा खून बहने की वजह से होने वाली खून की कमी की भरपाई के लिये मददगार होता है।
स्तनपान कैसे कराना चाहिए ?

शिशु को स्तनपान कराने का सही तरीका समय के साथ धीरे-धीरे सीखा जा सकता है, इसके लिये जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं है। इसके लिये गर्भावस्था और प्रसव के बारे में जानकारी देने वाली जगहों से; या परिवार के ऐसे सदस्य और दोस्त जिन्हें स्तनपान कराने का तर्जुबा हो, की सलाह ले सकते हैं पर कोशिश करें यह सीखते समय आप सभी एक साथ हों -आपके जीवनसाथी और परिवार के खास लोग।
  1. इसे सीखने के लिये समय देने के लिये तैयार रहें। याद रखें - शिशु को स्तनपान कराते समय ही दूध बाहर आता है।
  2. जन्म देने के एक घंटे के भीतर ही शिशु को अपना दूध पिलाना शुरू करें, इस समय अपनी सेहत का भी ध्यान रखें क्योंकि स्तनों में दूध भर जाने पर आप यह आसानी से महसूस कर सकती हैं इसलिये जरूरत के मुताबिक शिशु को स्तनपान कराती रहें।
  3. शिशु को अपनी गोद लेने के बाद आप जैसे ही आरामदायक स्थिति में आयें तो शिशु को उसका मुंह निप्पल के पास लाना सिखायें। शिशु को अपने स्तन के पास लाकर उसकी नाक या मुंह को निप्पल की बराबरी पर लाएं।
  4. आमतौर माँ के दूध की गंध की वजह से शिशु अपने मुंह को खुद-ब-खुद निप्पल के पास ले जाने लगते हैं। कुछ मामलों में एसा न होने पर शिशु के निचले होठ पर निप्पल से गुदगुदी करें जिससे वे अपना मुंह निप्पल के पास लाना सीख सकें।
  5. पहले 24 घण्टे के दौरान शिशु को 8-12 बार स्तनपान कराना चाहिए। एक बार स्तनपान कराने में 15-20 मिनट या इससे ज्यादा समय भी लग सकता है।
  6. शिशु भूखा होने पर क्या करता है, आपको उन इशारों के बारे में जानना भी जरूरी है। हो सकता है कि वह ज्यादा चैकन्ना हो जाये, तेजी से हाथ-पैर चलाये, रोये, अपने होठों को गुस्से में भींच ले या किसी भी चीज के उसके गाल या होठ के पास आने पर उसे चूसे।
  7. शिशु की हरकतों को पकड़ें। जैसे ही उसका पेट भरेगा - वह निप्पल छोड़ देगा या आराम से सो जायेगा। कुछ शिशु दो-तीन घूंट दूध पी कर ही सोने के आदी होते हैं तो माताओं को चाहिए कि ऐसे शिशुओं की पैरों में लगातार गुदगुदी करें या उनके कान को सहलायें जिससे वे भरपेट दूध पी सकें।
  8. हर बार दूध पिलाने के बाद शिशु को डकार दिलाने का ध्यान रखें। ऐसा न होने पर शिशु दूध पलट देते हैं और यह उनके नाक या मुंह से बाहर आ जाता है।

कैसे जाने शिशु भरपेट दूध पी रहा है या नहीं ?

जाने शिशु भरपेट दूध पि रहा है, यदि :
  1. दूध पिलाने के बाद स्तनों में नरमी और हल्कापन महसूस हो।
  2. शिशु को खुद ही डकार आ जाये।
  3. शिशु दिन भर में 8 से 20 बार साफ या हल्के पीले रंग का पेशाब करे।
  4. गीलेपन की वजह से दिन भर में 4 से 6 बार शिशु के डायपर बदलने की जरूरत पड़े।
पेरेन्ट्यून सुझावः अपने बिस्तर के सिरहाने शिशु को दूध पिलाने का एक चार्ट बना कर रखें जिससे आपको इस बारे में पता रहे। इसके साथ, हर बार दूध पिलाने के बाद स्तनों में बचे हुये दुध को निकाल दें और उन्हे सूखा रखें और बाद में शिशु को नुकसान न करने वाले किसी माॅइश्चराइजर का इस्तेमाल करें।

नई माताओं को होने वाली आम परेशानियां

  1. दूध न निकलनाः शुरूआत में यह किसी भी माँ के साथ हो सकता है पर एक या दो दिन के बाद आमतौर पर दूध निकलने लगता है लेकिन बिल्कुल दूध न निकलने पर आपको डाक्टर की सलाह लेने की जरूरत है। 
  2. दूध की कमीः यदि आपको लगता है कि शिशु आपके दूध से संतुष्ट नहीं हो पा रहा है तो यह पता करने की जरूरत है कि दूध निकालने वाले सुराख पूरी तरह से खुले हैं या नहीं - और शिशु को दूध पिलाना और पम्पिंग करना जारी रखें जिससे ज्यादा दूध बनने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिले।
  3. दूध का ज्यादा बननाः इसकी वजह से स्तनों का आकार बढ़ने और उनमें दर्द हो सकता है इसलिये जब आपको स्तनों में दूध का भराव महसूस हो तो इस बढ़े हुये दूध को दबा कर निकाल लें और आगे इस्तेमाल करने के लिये संभाल कर रखें। इस दूध को आप आस-पास के अस्पाताल में दे सकती हैं जिससे यह किसी वजह से अपने शिशु को दूध न पिला पाने वाली माता के काम आ सके। 
  4. दूध नली का बंद होनाः ऐसा तब होता है जब कोई दूध नली बंद हो जाती है जिसकी वजह से दूध पूरी तरह से बाहर नहीं निकल पाता और वहाँ सूजन आ जाती है। इसकी वजह से स्तन में गांठ पड़ जाती है जिसमें दर्द रहता है पर बुखार नहीं आता लेकिन अगर आपको बुखार आये तो यह एक तरह के स्तन संक्रमण का संकेत है जिसे मैसटीटिस कहा जाता है।
  5. अंदर दबे हुये/सपाट निप्पलः सपाट निप्पल दूध पीते समय बाहर तनने के बजाय अंदर धंस जाते हैं जिससे कई बार स्तनपान कराते समय कठिनाई होती है; स्तनपान कराते समय इन्हे आप उंगली से दबा कर या पम्पिंग के जरिये बाहर निकाल सकती हैं।

शिशु को होने वाली परेशानियांः

  1. शिशु का स्तनपान की जगह ठीक से न पहचान पानाः इसकी वजह से माँ और शिशु दोनों को कठिनाई होती है। 
  2. दूध छिद्रों का बंद होनाः यदि निप्पल के छिद्र पूरी तरह न खुले हों तो शिशु को देर तक दूध पिलाते रहने के बाद भी वह रोता रहता है। इससे निजात पाने के लिये जबरन दोनों हाथों से दबा कर दूध निकालने के बजाय निप्पल की हल्की गर्म सिकाई करें। ऐसा करने से सभी बंद सुराख खुल जायेंगे।
  3. उलझन में पड़नाः स्तनपान कराने में तरह-तरह के तरीकों के साथ कई तरह की चुसनी का इस्तेमाल करने पर शिशु उलझन में पड़ने लगते हैं और ऐसे में मुमकिन है कि शिशु ठीक से स्तनपान न कर सके और वे चिड़चिड़ाने लगते हैं।
  4. स्तनपान करा रही माताओं को हल्का और पौष्टिक खाना खाना चाहिए जिससे शिशु को गैस की तकलीफ से बचाया जा सके। स्तनपान कराने के पूरे समय के दौरान खाने में कैल्शियम, विटामिन डी और आयरन सप्लीमेंट को शामिल करना चाहिये।

जुड़वा या दो से ज्यादा शिशुओं का स्तनपानः

जुड़वा या दो से ज्यादा शिशुओं को स्तनपान कराना किसी माँ के लिये मुश्किल भरा हो सकता है और जुड़वा शिशुओं के तय समय से पहले पैदा होने की वजह से उन्हे ज्यादा स्तनपान कराने की जरूरत भी होती है। ऐसे में डबल् पम्पिंग की मदद से दूध की जरूरत को पूरा किया जा सकता है क्योंकि आप जितना ज्यादा पम्पिंग की मदद लेंगी, शरीर में दूध भी उतना ज्यादा बनेगा।

आप उन्हे एक-एक करके या ‘डबल् क्रेडल पोजीशन’ का इस्तेमाल करते हुए एक साथ स्तनपान करा सकती हैं। इसके लिए सबसे पहले आरामदायक स्थिति में बैठ जायें। दोनों शिशुओं को सामने लाकर इस तरह अपनी गोद में ले जिससे उनके सिर आपके बाजुओं पर अंदर की ओर हों। 

स्तनपान, कामकाजी माताऐं और इसके लिये कानूनः

बहुत से देशों में शिशु को स्तनपान कराने वाली कामकजी माताओं को घर में रहकर ही आॅफिस के काम करने की सहूलियत दी गयी है। इसके अलावा उनके काम करने वाली जगह पर में अलग से कुछ जगह स्तनपान/पम्पिंग करने के लिये बनाई जाती है और आॅफिस में ही एक शिशुओं की देखभाल और ध्यान रखने के लिये पालना-घर भी होते हैं जहाँ माताऐं अपने शिशु को स्तनपान करा सकती है। 

भारत में महिलाओं को प्रसूति के बाद वेतन सहित तीन महीने का छुट्टियां मिलती है पर इसके बाद उन्हे खुद तय करना करना होता है कि वे काम करने के दौरान शिशु को स्तनपान करायें या उसे पाउडर दूध पिलायें क्योंकि हमारे यहाँ स्तनपान कराने वाली कामकाजी माताओं के लिये इस तरह की कोई सहूलियत नहीं दी गयी है।

हालांकि, इस सम्बंध में पहले से जारी कानून में बदलाव की मांग की गई है पर जबतक नये सुझाव ठीक तरह से लागू नहीं होते, नई माताओं को सलाह है कि वे शिशु को स्तनपान कराने के लिये अपने काम करने वाली जगह पर अलग से कुछ जगह और पालना-घर के लिए मांग करें।

आपके शिशु की सलामती सबसे पहले है तो इसकी रक्षा के लिये कुछ भी करना पड़े, करिये। 

क्या यह लेख उपयोगी लगा? स्तनपान कराने को लेकर अपने खास लम्हों के बारे में हमें बतायें - हमें आपकी राय जानना अच्छा लगेगा। 

यह लेख हमारे साथ Parentune team ने साझा किया हैं। Parentune भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली पेरेंटिंग कम्युनिटी है जो पेरेंट्स को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त सलाह और सहयोग देती हैं। और जाने Parentune के बारे में - http://www.parentune.com/ 


एक माँ होते हुये क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है चांदी के बर्तनों में ऐसा क्या है जो हमारे बुर्जुगों को यह सलाह देने के लिये प्रेरित करता है कि बच्चों को खाने-पिलाने के लिए चाँदी के बर्तनों इस्तेमाल किया जाए? गर्भवती माताओं और बच्चों से जुड़ी रस्मों में खासतौर पर चांदी के उपहार ही देने को अहमियत क्यों दी जाती है?

जाहिर तौर पर, ऐसा माना जाता है कि चांदी की कीटाणुओं से लड़ने वाली खूबियां शिशु की रोग प्रतिकारक ताकत बढ़ाने में मददगार होती हैं इसलिए नई माताओं को अपने शिशु को चांदी के चम्मच से खाने-पिलाने के लिये सलाह दी जाती है।

हम बस आंख बंद करके अपने बड़ों की मान्यता और उनके तर्जुबे पर भरोसा कर लेते है पर हम आज इस लेख में आपको बच्चों को चांदी के बर्तनों में खाने-पिलाने से होने वाले 5 रोगनाशक फायदों के बारे में बताएँगे। 


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बच्चों को चांदी के बर्तनों में खिलाने के फायदे Health benefits of Silver utensils in Hindi

बच्चों को चांदी के बर्तनों में खिलाने के प्रमुख 5 फायदे इस प्रकार हैं :

1. चांदी में कीटाणू नहीं पनपते
ऐसा माना जाता है कि चांदी 100 प्रतिषत कीटाणु मुक्त होती है। इसी वजह से हमारे बड़े यह सलाह देते हैं कि बच्चों को दी जाने वाली खाने-पीने की चीजें चांदी के बर्तनों में दी जाएं। इसके साथ-साथ यह भी सच्चाई है कि चांदी में कीटाणु नहीं पनप सकते, इसलिये इन बर्तनों में कीटाणु खत्म करने के लिए किसी खास साफ-सफाई की जरूरत नहीं होती बस गर्म पानी से साधारण धुलाई करने से भी यह बर्तन दुबारा इस्तेामाल किये जा सकते हैं।

2. चांदी बच्चों की रोग प्रतिकारक ताकत / Immunity बढ़ाती है
कीटाणू खत्म कर देने वाली खूबी होने की वजह से चांदी के बर्तनों में खाने-पीने से शिशुओं और बच्चों की रोग प्रतिकारक ताकत बढ़ती है। इसकी दूसरी खासियत यह है कि चांदी के बर्तन में गर्म खाना परोसे जाने पर इसका असर हमारे खाने पर भी होता है क्योंकि कीटाणू खत्म करने वाली खूबियां खाने में मिल जाती हैं इसीलिये शिशु और बच्चों को खाने-पीने में चांदी के बर्तनों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है।



3. चांदी का गैर-विषाक्त होना
चांदी में गैर-विषाक्त या जहरीले तत्वों के खात्मे की खूबी होना एक बहस का मुद्दा है क्योंकि खालिस चांदी को जहरीला माना जाता है, पर दूसरी ओर यह मान्यता भी है कि खालिस चांदी को तपा कर बने बर्तनों में गैर-विषाक्तता बढ़ जाती है और इसमें जहरीले तत्वों का खात्मा करने का गुण आ जाता है इसीलिये ऐसा विश्वास है कि चांदी के बर्तन में खाने-पीने से न केवल जहरीले तत्वों से बचाव होता है बल्कि बच्चों की रोग प्रतिकारक ताकत भी बढ़ती है।

4. चांदी तरल चीजों की ताजगी बनाए रखती है
ऐसा माना जाता है कि चांदी के बर्तन में पानी या कोई अन्य तरल चीजों के रखे जाने पर इनकी ताजगी काफी समय तक बरकरार रहती है। पुराने समय मे, राजा-महाराजा अपने पीने के पानी और यहां तक कि शराब को भी चांदी की सुराही में रखा करते जिससे उसका स्वाद और ताजापन बरकरार रहे।

5. शरीर के तापमान को काबू में रखती है
चांदी में शिशु और बच्चों को फायदा पहुंचाने वाली हजारों खूबियां होती हैं और इनमें से एक है कि चांदी का इस्तेमाल हमारे शरीर के तापमान को काबू में रखता है और सामान्य बनाये रखता है और जाहिर तौर पर यही वजह है कि नवजात शिशुओं को पहनाये जाने वाले सामान चांदी के बने होते हैं।

यदि आप भी चांदी के अन्य दूसरे फायदों के बारे में जानती हैं तों हमे बतायें।
यह लेख हमारे साथ Parentune team ने साझा किया हैं। Parentune भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली पेरेंटिंग कम्युनिटी है जो पेरेंट्स को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त सलाह और सहयोग देती हैं। और जाने Parentune के बारे में - http://www.parentune.com/ 

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