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#उच्च रक्तचाप या जिसे अंग्रेजी में हाई ब्लड प्रेशर (#Hypertension) कहा जाता हैं यह भारत में तेजी से बढ़ने वाली एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या हैं। विश्व स्वास्थ्य संघटन (WHO) के मुताबिक 25 वर्ष से अधिक आयु के 40% लोग हाई ब्लड प्रेशर की समस्या से पीड़ित हैं। भारत में हर 3 में से एक युवा व्यक्ति को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या होती हैं।

हाई ब्लड प्रेशर के 50% से अधिक मरीज ऐसे होते है जो यह मानने को तैयार नहीं होते की उन्हें यह समस्या है और अक्सर ऐसे रोगी अपनी दवा बिच में ही बंद कर देते है। हाई ब्लड प्रेशर यह इतनी बड़ी समस्या होने के बावजूद भी समाज में इसे लेकर कोई जागरूकता या सम्पूर्ण जानकारी नहीं हैं।

हाई ब्लड प्रेशर / #Hypertension से जुड़े उच्च अहम सवालों के जवाब देने की कोशिश हमने इस लेख में की हैं। अधिक जानकारी के लिए आगे पढ़े :

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1. ब्लड प्रेशर किसे कहते हैं ?

हमारे शरीर में रक्त नलिकाओं में बहते समय रक्त, रक्त नलिकाओं की दीवार पर जिस प्रेशर से दबाव डालता है उसे ब्लड प्रेशर कहा जाता है। 

2. सामान्य ब्लड प्रेशर का स्तर कितना होता हैं ?


सामान्य सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर यानी ऊपर का ब्लड प्रेशर 110 से 130 mmhg तक होता हैं। 
डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर यानि की नीचे का ब्लड प्रेशर 70 से 84 mmhg तक होता हैं।  

3 किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर ज्यादा है ऐसा कब कहा जा सकता हैं ?


किसी भी व्यक्ति ऊपर का ब्लड प्रेशर यानि की सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर 140 या 140 mmhg से ज्यादा रहने पर या निचे का ब्लड प्रेशर 90 या 90 mmhg से ज्यादा रहने पर उस व्यक्ति का ब्लड प्रेशर ज्यादा है ऐसा कहा जा सकता हैं। 

4. मुझे कोई तकलीफ नहीं है लेकिन डॉक्टर का कहना है कि मुझे हाई ब्लड प्रेशर है ! ऐसा कैसे हो सकता है ?

हाई ब्लड प्रेशर एक साइलेंट किलर है। हाई ब्लड प्रेशर के अधिकतर मरीजों में कोई लक्षण नजर नहीं आते हैं और किसी अन्य समस्या के लिए डॉक्टर के पास जाने पर हाई ब्लड प्रेशर का पता चलता है। हाई ब्लड प्रेशर का प्रभाव शरीर पर धीरे-धीरे होता है और जब यह परिणाम नजर आते हैं तब उन लक्षणों का स्वरूप बहुत बड़ा होता है। जैसे कि पैरालाइसिस, हार्ट अटैक, किडनी फेलियर इत्यादि। इसीलिए हाई ब्लड प्रेशर के लक्षण नजर आने की राह न देखे। ब्लड प्रेशर बढ़ जाने पर तुरंत उपचार शुरू करें। 

5. एक बार हाई ब्लड प्रेशर की दवा शुरू करने पर मुझे उन दवाई की आदत हो जाएगी और मुझे हमेशा के लिए वह दवाई लेनी होगी !

यह आपकी सोच गलत है। किसी भी हाई ब्लड प्रेशर के रोगी के लिए दवा लेना एक जरूरत है ना की आदत। एक बार ब्लड प्रेशर बढ़ जाने के बाद संभावना यही रहती है कि वह हमेशा बड़ा हुआ रहेगा। अगर आपने उसका उपचार नहीं किया तो ऊपर दिए गए हो गंभीर परिणाम हो सकते हैं। आपके शरीर में ब्लड प्रेशर के ऊपर का नियंत्रण खो दिया है इसीलिए आपको दवा लेने की जरूरत है। दवा लेकर अपने बढ़े हुए ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने के अलावा आपके पास कोई अन्य उपाय नहीं है।

जिन लोगों का ब्लड प्रेशर उन कारणों से बड़ा है जीने हम सुधार सकते हैं ऐसे लोग अपने उस कारण को ठीक कर अपने दवा की मात्रा / Dose को कम कर सकते हैं और जिनका ब्लड प्रेशर केवल थोड़ा ही बड़ा है वह लोग अपनी दवा बंद भी कर सकते हैं। ऐसे लोग जिनका रक्तचाप बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ होता है वह अपनी दवा बंद नहीं कर सकते हैं।

6. एक बार ब्लड प्रेशर नियंत्रण में आने पर क्या मैं अपनी हाई ब्लड प्रेशर की दवा बंद कर सकता हूं ?


जी नहीं ! हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित किया जा सकता है पर उसे जड़ से ठीक नहीं किया जा सकता है। एक बार हाई ब्लड प्रेशर की तकलीफ हो जाने पर आपको जिंदगी भर दवा लेने की जरूरत होती है। अगर आप 1 दिन भी हाई ब्लड प्रेशर की दवा नहीं लेते हैं तो आप का प्रेशर बढ़ सकता है। हाई ब्लड प्रेशर की दवा रोजाना लेना बेहद जरूरी है। ब्लड प्रेशर की दवा अचानक बंद करना बेहद नुकसानदेह हो सकता हैं। 

7. हाई ब्लड प्रेशर की दवा कितने समय लेनी चाहिए ?

ब्लड प्रेशर की ज्यादातर दवा 24 घंटे तक काम करती है इसलिए दिन में एक बार ही दवा लेने की जरूरत होती है। रोजाना तय समय पर ही अपनी दवा ले। आधा से एक घंटा आगे-पीछे हुआ तो कोई बात नहीं पर ज्यादा अंतराल न करें। आपको कोई अन्य तकलीफ ना हो इसलिए तय समय पर दवा लेने की आदत डालें। डॉक्टर आपके ब्लड प्रेशर बढ़ने के समय के अनुसार सुबह या शाम में दवा लेने को कह सकते हैं। 

8. अगर मैं कभी अपनी ब्लड प्रेशर गोली लेना भूल जाऊं तो मुझे क्या करना चाहिए ?

ऐसे मामले में तुरंत दवा लेना चाहिए। हमेशा अपने जेब में या अपने कार्यस्थल पर दवा की अतिरिक्त खुराक पास में रखें। घबराए नहीं और तुरंत अपनी दवा ले। 

9. मैं और मेरे मित्र दोनों हाई ब्लड प्रेशर के रोगी है परंतु मेरा मित्र 5 मिलीग्राम की दवा लेता है और मैं 40 मिलीग्राम की दवा। मुझे इतने बड़ी मात्रा में दवा लेने की क्या आवश्यकता है ?

बाजार में कई प्रकार की हाई ब्लड प्रेशर की दवाएं हैं। हर दवा का निम्न मात्रा (Minimum Dose) अलग-अलग है। जैसे अगर आप Amlodipine दवा लेते हैं तो उसकी निम्न मात्रा 2.5 से 5 मिलीग्राम है और अगर आप Telmisartan दवा लेते हैं तो उसकी निम्न मात्रा 40 मिलीग्राम है। हर रोगी को आवश्यकता अनुसार अलग-अलग गोली अलग-अलग मात्रा में दी जाती है। इसलिए घबराएं नहीं। डॉक्टर आपके शरीर के लिए सुरक्षित दवा ही लिखकर देते हैं। 

10. मेरे एक मित्र है जिन्हें हाई ब्लड प्रेशर था। उन्होंने कई दिनों से अपनी दवा बंद कर ली है और उनका ब्लड प्रेशर अभी भी सामान्य है। ऐसा कैसे हो सकता है ?

हाई ब्लड प्रेशर के 90% मामलों में इसका मुख्य कारण का पता नहीं होता है। ऐसे कई घटक है जिनका आपके ब्लड प्रेशर पर असर पड़ता है। कुछ ऐसे कारण हैं जिन्हें हम रोक / कम कर सकते हैं और कुछ ऐसे कारण हैं जिन्हें हम सुधार / कम नहीं कर सकते हैं। 
  • ऐसे कुछ घटक जिसमें सुधारना नहीं की जा सकती है, वह है : a) अनुवांशिकता और b) उम्र 
  • ऐसे घटक जिन्हे हम सुधार सकते हैं, वह है : a) मोटापा b) तनाव c) नमक का अधिक उपयोग और d) धुम्रपान
11 हाई ब्लड प्रेशर का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ?

हाई ब्लड प्रेशर का हमारे शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 

a) ह्रदय / Heart : हाई ब्लड प्रेशर का सबसे गंभीर दुष्परिणाम हमारे ह्रदय पर पड़ता है। लंबे समय तक हाई ब्लड प्रेशर होने से हमारे ह्रदय को इस उच्च ब्लड प्रेशर के दबाव का सामना करना पड़ता है जिससे हमारे ह्रदय की दीवारें मोटी / thick हो जाती है और उसकी लवचिकता / elasticity कम हो जाती है। इसी कारण ह्रदय की रक्त को पंप करने की शक्ति भी कम हो जाती है। हाई ब्लड प्रेशर से हार्ट अटैक आने की संभावना बढ़ जाती है। आपके ह्रदय में हाई ब्लड प्रेशर से सूजन आ कर हार्ट फेल होने का खतरा भी रहता है। 

b) रक्त नलिकाएं / Arteries : लंबे समय तक हाई ब्लड प्रेशर रहने से रक्त नलिकाओं मोटी हो जाती है और उनकी लवचिकता भी कम हो जाती है। हाई ब्लड प्रेशर से रक्त नलिकाओं में कोलेस्ट्रोल जमा होने की गति तेज हो जाती है जिससे हार्ट अटैक आने की संभावना बढ़ जाती है।

c) मस्तिष्क / Brain : हाई ब्लड प्रेशर होने से ब्रेन तक पहुंचने वाली सूक्ष्म रक्त नलिकाओं मैं अत्याधिक प्रेशर के कारण रक्त नलिकाए फूटने की संभावना होती है। इसमें कोलेस्ट्रोल जमा होने से पैरालिसिस होने का खतरा रहता है।


d) किडनी / Kidney : रक्त में जमा हुआ कचरा अलग कर रक्त को साफ करने का काम किडनी करती है। हाई ब्लड प्रेशर के कारण रक्त की सफाई ठीक तरह से न होने से प्रोटीन लॉस अधिक होता है जिससे किडनी फेल होने की संभावना रहती है।


e) आँखे / Eyes : हाई ब्लड प्रेशर के कारण रेटीना पर प्रतिकूल परिणाम पड़ता है। हाई ब्लड प्रेशर के कारण आंखों की रोशनी कम हो सकती है और आँखों की रौशनी भी जा सकती है। 

f) पैरों की नसें / Perpheral Arteries : उच्च रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल के अधिकता से पैरों की नसें ब्लॉक होकर पैरों में दर्द और गैंग्रीन जैसी गंभीर स्थिति निर्माण हो सकती है।



12. हाइ बलड प्रेशर से और कौन से अन्य रोग निर्माण हो सकते हैं?

हाई ब्लड प्रेशर के कारण भविष्य में डायबिटीज हो सकता है। हाई ब्लड प्रेशर के कारण हार्टअटैक, किडनी फेल होना, हाथ-पैर की नसों के रोग हो सकता है। 

13 हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों ने अपने आहार में क्या सावधानी बरतनी चाहिए ?

हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों ने अपने आहार में निचे दि हुई सावधानी बरतनी चाहिए :

a) नमक : हाई ब्लड प्रेशर के रोगी ने अपने आहार में कम से कम नमक का सेवन करना चाहिए। नमक में मौजूद सोडियम शरीर में पानी की मात्रा बढ़ाता है जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा रहता है। 

b) तेल / Oil : हाई ब्लड प्रेशर के रोगी ने अपने आहार में तेल और तली हुई चीजों का कम से कम सेवन करना चाहिए।

c) कोलेस्ट्रोल / Cholesterol : हाई ब्लड प्रेशर से कोलेस्ट्रोल बढ़ने की संभावना रहती है। अपने आहार में कोलेस्ट्रोल युक्त चीजों का सेवन कम से कम करें जैसे रेड मीट, प्रॉन, अंडे का पीला भाग इत्यादि। 

14 हाई ब्लड प्रेशर के रोगी ने अपने दैनंदिन जीवन शैली में क्या बदलाव करना चाहिए ?

अपने ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने के लिए हाई ब्लड प्रेशर के रोगी ने निचे दी हुई बातों का ख्याल रखना चाहिए : 

a) नींद / Sleep : हाई ब्लड प्रेशर के रोगी में पर्याप्त मात्रा में नींद लेना बेहद जरूरी है। पर्याप्त मात्रा में नींद लेने से तनाव कम होता है। 

b) तनाव / Stress : अधिक तनावयुक्त जीवन शैली से ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा दुगना हो जाता है। तनाव मुक्त जीवन जीने की कोशिश करें। तनाव की मात्रा को कम करने के लिए मेडिटेशन करें, अपना रोजाना शेड्यूल तय करें, शांत मनस्थिति रखें ,अपने व्यस्त काम से थोड़ा समय निकालकर खुशहाल जिंदगी जीने की कोशिश करें।

c) व्यायाम / Exercise : शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम करना बेहद जरूरी है। व्यायाम करने से हम रिलैक्स महसूस करते हैं और हमारा शरीर को शांति मिलती है। व्यायाम करने से हमारा वजन नियंत्रित होता है जो की ब्लड प्रेशर को कम करने के लिए जरूरी है। अगर आपका ब्लड प्रेशर बेहद ज्यादा है तो डॉक्टर की सलाह लेकर ही व्यायाम शुरु करें। हल्के व्यायाम से शुरुआत करें और अभ्यास के साथ धीरे-धीरे व्यायाम की समय अवधि बढ़ाए। वजनदार व्यायाम के जगह एरोबिक एक्सरसाइज आपकी सेहत के लिए ज्यादा उपयोगी है।

d) आहार / Diet : आहार में नमक का प्रमाण कम रखें। समतोल पौष्टिक आहार ले। हरी पत्तेदार सब्जियों का समावेश करें। फल खाएं और तली हुई चीजों का सेवन कम करें। 

e) व्यवहार / Behaviour : गुस्सा आपके शरीर के लिए हानिकारक है। हमेशा शांत रहने की कोशिश करें। संयम रखें और किसी भी परिस्थिति को शांतिपूर्ण वातावरण में सुलझाने की कोशिश करें। हमेशा सकारात्मक नजरिया रखें और ऐसी किताबें पढ़ें जिससे आपको प्रेरणा मिलती है।


15 मैंने अपने हाई ब्लड प्रेशर की दवा को किस तरह लेनी चाहिए ?

हाई ब्लड प्रेशर के रोगी ने अपने आहार में नीचे दिए हुए सावधानी बरतनी चाहिए :

आपके आवश्यकता अनुसार डॉक्टर आपको हाई ब्लड प्रेशर की दवा लिख कर देते हैं। डॉक्टर आपको दवा चालू करते समय निम्न स्तर / low dose से दवा शुरु करते हैं और आवश्यकता अनुसार धीरे-धीरे दवा का डोज बढ़ाते हैं। एक बार आपको दवा निर्धारित होने पर वही दवा लेना होता है और समय-समय पर अपना रक्तचाप जांच करना होता है। 
  • डॉक्टर की सलाह अनुसार सुबह या शाम के समय दवा लें रोजाना तय समय पर ही अपनी दवा ले। 
  • दवा के समय में अधिक फेरफार ना करें। 
  • ब्लड प्रेशर की अधिकतर दवा का असर 24 घंटे तक रहता है इसलिए वह गोली दिन में एक बार ही लेना होता है। 
  • ब्लड प्रेशर की दवा के साथ चाय-नाश्ता आहार लेने की जरूरत नहीं होती है। आप इस दवा को खाली पेट में ले सकते हैं। 
  • अपने ब्लड प्रेशर की दवा को बिना तोड़े पूरी दवा ले। दवा को तोड़ने से दवा का असर कम हो सकता है। 
  • अगर आप कभी दवा लेना भूल जाते हैं और आपको बाद में याद आता है तो तुरंत अपनी दवा ले। 
  • अपने दवा की अतिरिक्त खुराक हमेशा अपने जेब में या ऑफिस में रखें अपने दवा का डोज़ कभी ना बदले। 
  • अपने शरीर पर कोई एक्सपेरिमेंट ना करें। 
  • अगर आपकी कोई शिकायत या सवाल है तो अपने डॉक्टर से मिलें और उस शंका का निराकरण करें।
  • अपने मन से या किसी और की सहायता से अपनी दवा में फेरफार न करें। डॉक्टर को दिखाने के दिन अपनी दवा लेना ना भूले। 
  • अगर आपको कोई अन्य बीमारी है तो इसकी जानकारी अपने डॉक्टर को अवश्य दें। 
हाई ब्लड प्रेशर की एक छोटी सी गोली रोजाना लेकर आप अपने शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को होनेवाले भयानक दुष्परिणाम से बचा सकते हैं। हाई ब्लड प्रेशर को आप नियंत्रित कर सकते है पर पूरी तरह से ठीक कर पाना बेहद मुश्किल हैं। कभी भी बिना डॉक्टर की सलाह लिए अपनी दवा बंद न करे। हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने के लिए आप योग, ध्यान, व्यायाम, समतोल आहार और जीवनशैली परिवर्तन कर सकते है और इससे आपको लाभ भी होता है परंतु दवा बंद करने की जरुरत है या नहीं इसका निर्णय आपके डॉक्टर को ही लेने देना चाहिए। 

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Image source : classroomclipart.com

#हेपेटाइटिस / Hepatitis, यह बैक्टीरिया से फैलने वाला ऐसा इंफेक्शन है जो सीधे तौर पर लिवर को प्रभावित करता है। सामान्य भाषा में इसे हम पीलिया या जॉन्डिस नाम से जानते हैं। हेपेटाइटिस से एक बार लीवर को नुकसान होने के बाद रिकवर होना मुश्किल हो जाता है। हेपेटाइटिस पांच प्रकार के होते हैं - हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी, और ई ! फिलहाल दुनिया में सबसे ज्यादा लोग हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी के शिकार है।

#हेपेटाइटिस सी वायरस एड्स के वायरस से 10 गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है। 25% हेपेटाइटिस पीड़ित मरीज ऐसे होते हैं जो अपने बीमारी के बारे में परिवार के दोस्तों को कुछ नहीं बता पाते हैं। 80% लोग हेपेटाइटिस के कारण लिवर कैंसर से मारे जाते हैं। 6 लाख लोग सालभर में इसके शिकार बनते हैं।

4000 से ज्यादा लोग हर दिन हेपेटाइटिस के कारण बीमार पड़ते हैं। 2 अरब के लगभग दुनिया में लोगों का वर्तमान या पहले कभी भी हेपेटाइटिस बी संक्रमण होने का सेरोलॉजिकल प्रमाण है। भारत में ही हर साल हेपेटाइटिस से 1 लाख लोगों की मृत्यु होती है।

सभी प्रकार के हेपेटाइटिस के लक्षण और उनसे बचने के उपाय की जानकारी निचे दी गयी हैं :

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हेपेटाइटिस के लक्षण क्या हैं ?
Symptoms of Hepatitis in Hindi 

हेपेटाइटिस बीमारी की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इसका पता जल्दी नहीं लगता है और साल भर तक ऊपर से कोई खास लक्षण नजर नहीं आते हैं जैसे की कैंसर में होता है। डॉक्टर हेपेटाइटिस के कुछ लक्षण इस प्रकार मानते हैं :
  1. बॉडी और आंखों में पीलापन 
  2. पेशाब का रंग पीला होना 
  3. थकावट 
  4. उल्टी 
  5. पेट दर्द 
  6. भूक की कमी 
जानकारी के अभाव में हेपेटाइटिस सी के 80% और हेपेटाइटिस बी के 70% मरीजों में बीमारी का पता ऐसे चरण में लगता है जब उनका इलाज संभव नहीं होता है। विश्व भर में सभी प्रकार की हेपेटाइटिस में हेपेटाइटिस बी में सबसे बड़ी चिंता का विषय बन चूका हैं।

सभी प्रकार के हेपेटाइटिस से बचने के उपाय क्या हैं ?
Hepatitis prevention tips in Hindi

हेपेटाइटिस से बचने के उपाय

सभी प्रकार के हेपेटाइटिस से बचने के उपाय की जानकारी निचे दी गयी हैं :

हेपेटाइटिस ए से बचाव

  • अगर आप ऐसी जगह जा रहे हैं या हेपेटाइटिस ए का खतरा है तो हेपेटाइटिस ए का वैक्सीन लगवा लेना ठीक रहेगा। हेपेटाइटिस ए वैक्सीन के 6 महीने के अंतराल से दो इंजेक्शन लेना होता हैं। इसकी अधिक जानकारी आप अपने डॉक्टर से ले सकते हैं।  
  • शौच के बाद अपने हाथ साबुन से धो लें। 
  • तुरंत पका हुआ ही भोजन खाएं। 
  • उबला हुआ पानी या बोतल बंद पानी पिए। ब्रश करने के लिए भी इस पानी का ही उपयोग करे।  
  • छिल कर खाने वाले फल ही खाएं। 
  • कच्ची सब्जियों का सेवन अधिक न करें। 
  • सुरक्षित यौन संबंध रखे। 

हेपेटाइटिस बी से बचाव

Hepatitis B से बचने के लिए निचे दिए हुए एहतियात बरतने चाहिए :
  • सलून में शेविंग या बाल कटाते समय हमेशा नयी ब्लेड  इस्तेमाल करने का आग्रह करे। 
  • निर्जंतुक सुई - अस्पताल में हमेशा निर्जंतुक सुई या ब्लेड का इस्तेमाल करे। 
  • सुरक्षित यौन संबंध - अपरिचित व्यक्तिओ के साथ यौन संबंध न रखे। व्यक्ति के स्वास्थ्य की जानकारी न होने पर यौन संबंध करते समय कंडोम का इस्तेमाल करे। 
  • Tattoo कराते समय या कान छिदवाते समय निर्जंतुक सुई का इस्तेमाल हो रहा है इसका ध्यान रखे। 
  • अपने शेविंग ब्लेड या टूथ ब्रश किसी भी व्यक्ति के साथ शेयर न करे। 
  • Hepatitis B vaccine - बच्चों को जन्म के समय पहला डोस, 1 महीने पर दूसरा डोस और 6 महीने में तीसरा डोस देकर Hepatitis B से सुरक्षा दे सकते हैं। Combination वैक्सीन इस्तेमाल करने पर या जरुरत पड़ने पर 4 booster डोस दे सकते हैं। 18 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों ने यह वैक्सीन जरूर लगाना चाहिए। यह वैक्सीन लगाने पर अगले 20 वर्षो तक Hepatitis B होने का खतरा 95% तक कम हो जाता हैं। जिन व्यक्तिओ को Hepatitis B होने का खतरा है उन्होंने भी इस वैक्सीन के 3 डोस डॉक्टर की सलाहनुसार लगाने चाहिए। 

हेपेटाइटिस सी से बचाव

  • अपने घाव को खुला न छोड़े। 
  • शराब से दूरी बनाए रखें। 
  • दवाई की उपकरण को शेयर ना करें। 
  • टैटू करवाए तो यह देख ले कि उपकरण अच्छे से साफ हो या टेटू बनवाने से बचे। 
  • खून चढाने से पहले उसकी जांच अवश्य होनी चाहिए। 
  • निर्जंतुक सुई - अस्पताल में हमेशा निर्जंतुक सुई या ब्लेड का इस्तेमाल करे। 
  • सुरक्षित यौन संबंध बनाये। 

हेपेटाइटिस डी से बचाव

  • जो व्यक्ति हेपेटाइटिस बी से संक्रमित वही हेपेटाइटिस डी से भी संक्रमित हो सकता है इसलिए हेपेटाइटिस बी के लिए हेपेटाइटिस बी के ही सभी दिशा निर्देशों का पालन करें। 

हेपेटाइटिस ई बचाव

  • हेपेटाइटिस ई से संक्रमित लोगों के लिए हेपेटाइटिस ए के ही नई दिशा निर्देशों का पालन करें। 

हेपेटाइटिस को रोकने के लिए क्या करें
Tips to prevent Hepatitis in Hindi

  • अगर आप जानते हैं कि हेपेटाइटिस किन कारणों से संक्रमित होता है तो आप इसके जोखिम को कम कर सकते हैं। 
  • अपने टूथब्रश और शेविंग रेजर को दूसरों के साथ ना बाटे। 
  • सुरक्षित ढंग से इंजेक्शन ना लगाएं। 
  • सुरक्षित ढंग से यौन संबंध बनाए। 
  • मां से बच्चे में खून के द्वारा संक्रमण होने से रोके। 
  • दवा लेने देने के उपकरणों को दूसरे के साथ ना साझा करें। 
  • असुरक्षित ढंग से खून देना या लेना से फैलता है वह ना करें। 
  • वैक्सीन लगवा में देरी ना करें। हेपेटाइटिस बी वैक्सीन लगवाने से नियंत्रित हो सकता है जो हेपेटाइटिस बी विषाणु के संवाहक के रसिया शरीर के तरल पदार्थों के सीधे संपर्क में आता है उसे हेपेटाइटिस बी एम लोग लोग मिल के एक या अधिक टिके हेपेटाइटिस बी 7 लगवाने चाहिए हिमोग्लोबिन अस्थाई जबकि टीका बीमारी से दीर्घकालिक रक्षा करता है
  • टेस्ट करवाएं। 
  • सजग रहे। नई तकनीकों के साथ हेपेटाइटिस के टेस्ट उपलब्ध है जो जल्द और अच्छे नतीजे देते हैं।  
  • कोई भी लक्षण दिखने पर बिना देरी किए जांच करवाएं और नतीजे के अनुसार इलाज प्रारंभ करें। इस बीमारी में थोड़ी सी भी लापरवाही जान पर भारी पड़ सकती है। ऐसे मामलों में नीम हकीमों के पास जाना बेहद घातक हो सकता है। 
  • छुपाए नहीं उपचार कराएं। हेपेटाइटिस सी का उपचार उपलब्ध है और इसमें 90 से 95% ठीक हो जाते हैं। संक्रमण से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है कि संक्रमित व्यक्ति के रक्त और शरीर के तरल पदार्थों जिसमें वीर्य / Semen भी शामिल है कि संपर्क से बचा जाए। 
  • रक्त चढ़ाते समय सिरिंज का इस्तेमाल साझा तौर पर ना करें। 
हेपेटाइटिस का समय पर उपचार और एहतियात का पालन न करने पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। हेपेटाइटिस से बचने के लिए हमें हर संभव प्रयास करने चाहिए। हेपेटाइटिस होने पर हमें घरेलु उपाय या नुस्खों में समय बर्बाद करने की जगह तुरंत डॉक्टर से उपचार कराना चाहिए और उनकी सलाह का पालन करना चाहिए। 
Image courtesy of Sira Anamwong at FreeDigitalPhotos.net

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अगर आप रोजाना चिड़चिड़े उदास या तनाव में रहते हैं और हार्मोन संबंधी समस्या भी है तो ऐसे में #विपरीत करनी मुद्रासन या जिसे अंग्रेजी में Legs up the wall कहा जाता हैं, लाभकारी हो सकता है। मानसिक तनाव और चिंता को दूर कर मन को शांत करने के लिए यह एक उपयोगी योग हैं। शरीर को बलशाली बनाने, बुढ़ापे को दूर रखने और कामशक्ति (सेक्स पॉवर) बढ़ाने के लिए यह श्रेष्ठ आसन माना जाता हैं।   

विपरीत करनी मुद्रासन की विधि, लाभ और सावधानी से जुडी अधिक जानकारी निचे दी गयी हैं :
Viparita-Karani-Yoga-Asana-steps-benefits-hindi-language

विपरीत करनी मुद्रासन की विधि 

  • एक समान। सपाट और स्वच्छ जगह पर दरी / चटाई या योगा मैट बिछाये। 
  • अब इस पर पीठ के बल सीधे लेटे। 
  • दोनों हाथों को सीधा रखें। 
  • सांस लेते हुए घुटनों को ऊपर की ओर मोड़ो। 
  • दोनों हाथों को कूल्हों (Hips) के नीचे लाएं व कोहनी (Elbow) को फर्श पर टिका कर रखें। 
  • अब हाथों की सहायता से पैरों को ऊपर की तरफ सीधा उठाएं। 
  • सामान्य सांस लेते हुए क्षमता अनुसार रुके।  
  • सांस छोड़ते हुए घुटनों को माथे की ओर मोड़े  व धीरे-धीरे सामान्य मुद्रा में आ जाएं। 
  • इसे दो से तीन बार दोहराएं। 
  • इस आसन के पश्च्यात शवासन करे। 
  • इस आसन को आप दीवार का सहारा लेकर भी कर सकते हैं। 
विपरीत करनी मुद्रासन के लाभ 
  • यह आसन निम्न रक्तचाप (Low BP), पैरों में सूजन, नाडी के रोग, ग्रंथि की सक्रियता में कमी, पेट व किडनी संबंधी रोगों में आराम पहुंचाकर उर्जा और रक्त संचार को बढ़ाता है। 
  • मानसिक तनाव दूर होता हैं। 
  • रक्त संचार सुचारू रूप से होता हैं। 
  • खासकर महिलाओं में अनियंत्रित हॉर्मोन की समस्या को दूर करने के लिए बेहद उपयोगी आसन हैं।  
  • रोग प्रतिकार शक्ति बढ़ती हैं। 
  • बुढ़ापे को दूर भगाने और सेक्स पॉवर बढ़ाने के लिए श्रेष्ठ आसन माना जाता हैं। 
  • शरीर की थकावट दूर होती हैं। 
विपरीत करनी मुद्रासन में सावधानी 
  • 14 साल से कम उम्र के बच्चे यह अभ्यास ना करें। 
  • इसे सुबह खाली पेट ही करें 
  • उच्च रक्तचाप (High BP), चक्कर आने व रीड की हड्डी में तकलीफ होने पर इसका अभ्यास ना करें। 
  • महिलाओं ने मासिक धर्म के समय और गर्भावस्था में यह आसन नहीं करना चाहिए। 
किसी भी योग को करते समय उसे अपने क्षमतानुसार ही करे और धीरे-धीरे अभ्यास को बढ़ाना चाहिए। आसन करते समय कोई परेशानी होने पर योग विशेषज्ञ की सलाह लेना चाहिए। अपने शरीर को सशक्त, स्वस्थ और युवा बनाये रखने के लिए इस योग का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। 

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Image By Kennguru - Own work, CC BY 3.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=25223503

मां बनना स्त्री के जीवन में गौरव की बात होती है और स्तनपान कराना स्त्री का परम सौभाग्य होता है। 
अक्सर स्त्रियों या माताओं के सामने यह समस्या होती है कि वह स्तनपान के दौरान अपना आहार-विहार कैसे रखें क्योंकि उन्हें अपने और अपने बच्चे के स्वास्थ्य की फिक्र रहती है और ऐसे में जब उन्हें अपने रिश्तेदार, अडोस-पडौस या डॉक्टर से अलग-अलग सलाह मिलती है तो वे और भी कंफ्यूज हो जाती है । इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए हमने यह लेख लिखा है और कोशिश की है आपको पौष्टिक और आसान आहार बता सके जो माता और शिशु दोनों के लिए सही हो। 

स्तनपान के दौरान आपको एक विशेष बात का ख्याल रखना है कि आपका आहार पोष्टिक हो और आपकी जरूरत के हिसाब से हो यानी कि आपको जितनी बार भूख लगे आप उतनी बार खाना खा सकते हैं क्योंकि स्तनपान आपकी भूख भी बढ़ाता है अतः अपने खानपान का विशेष ध्यान रखें। 

स्तनपान के दौरान माता ने कैसा आहार लेना चाहिए इसकी अधिक जानकारी निचे दी गयी हैं :


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कैसा होना चाहिए #स्तनपान के दौरान #माता का #आहार ?

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गर्भावस्था के दौरान अधिकतर जिस प्रकार के पौष्टिक आहार का चयन करते हैं वह प्रक्रिया आपको अभी भी शुरू रखनी चाहिए आपका आहार न सिर्फ पौष्टिकता से पूर्ण बल्कि संतुलित भी होना चाहिए। आहार ऐसा हो जो प्रोटीन, कैल्शियम , आयरन और खासकर विटामिन  A , B 12 , C और जिंक जैसे खनिज से भरपूर हो, साथ ही जो आपको अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करे। कोशिश करें कि अधिक फैट और चीनी युक्त खाद्य पदार्थ कम ले, इनमें अधिक कैलोरीज के बावजूद पोषण मूल्य कम होता है। 

महिलाओं को आहार का चयन इस बात पर भी निर्भर करता है कि स्तनपान के शुरुआती 6 महीने है या अगले 6 से 12 महीने का समय क्योंकि शुरुआत 6 महीने में आहार की आवश्यकता, प्रोटीन और एनर्जी की मात्रा अधिक होती है। 
  • अपने आहार में दूध और दूध के उत्पादन, पुर्ण अनाज ( गेहूं, ज्वार, चावल, बाजरा, रागी, नाचनी आदि ), दालें,  फलिया,  हरी सब्जियां जैसे मेथी, पालक, बथुआ, सरसो एवं ताजे फलों खासकर ऑरेंज, निम्बू, पाइनापल, आम, पपया आदि का सेवन अधिक करें।  सिंगदाना, गुड़, नारियल आदि अधिक मात्रा में ले। 
  • कुछ विशेष खाद्य पदार्थ है जो स्तनपान कराने वाली माताओं को दिए जाते हैं जिनसे माताओं को मदद मिलती है। हालाँकि इनका सेवन सिमित मात्रा में करना चाहिए। 
  1. मेथी के बीज : मेथी में ओमेगा 3 वसा, बीटा केरोटीन, विटामिन, आयरन, कैल्शियम आदि का समावेश होता है जो माता और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। इन बीज का उपयोग हम सब्जी, परांठे, पूरी आदि में कर सकते हैं। 
  2. सौंफ : शिशु को गैस और पेट दर्द से बचाने के लिए नई मां को सौंफ दी जाती है। 
  3. जीरा : कैल्शियम और राइबोफ्लेविन से समृद्ध जीरा स्तन्य वृद्धि के साथ अपचन, कब्ज और पेट फुलना आदि से भी राहत देता है। 
  4. तिल के बीज : तिल के बीज में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है जो कि स्तन्य आपूर्ति के लिए जरूरी होता है। तिल का उपयोग हम लड्डू,  पूरी, खिचड़ी, बिरयानी आदि में कर सकते हैं।
  5. तुलसी : तुलसी से स्तन्य वृद्धि तो नहीं होती है पर इम्यूनिटी बढ़ाने में यह सहायता करती है।
  6. सुवा : आयरन, मैग्नीशियम, कैल्शियम से भरपूर सुवा के पत्ते दुग्ध उत्पत्ति के साथ पाचन और नींद में भी सहायक होते हैं। 
  7. लौकी, तोरी जैसी सब्जियां स्तन्य बनाती है, पौष्टिक होकर भी कम कैलोरी युक्त होती है। साथ ही आसानी से पच जाती है। पालक, मेथी, सरसों बधुआ जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां आयरन, कैल्शियम और फोलेट जैसे खनिजों के स्रोत से समृद्ध होती है। 
  • स्तनपान कराने वाली माता के आहार में दिनभर में कम से कम 500 ml दूध जरूर होना चाहिए।
  • आहार में भोजन के बीच या जब भी जरूरत हो लिक्विड की मात्रा अधिक से अधिक रखें जैसे दाल , नारियल पानी, छांछ, लस्सी , ताजा फलों का रस , नींबू पानी आदि।  कोल्ड ड्रिंक के सेवन से बचे। 
  • दाल में रोटी चूरकर खाएं इससे दाल अधिक मात्रा में खा  पाएंगे। विशेषतः मसूर की दाल में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। 
  • पर्याप्त मात्रा में पानी पीए। हो सके तो सुबह  उठने के बाद दोपहर और रात में एक-एक ग्लास गर्म पानी पिए। 
  • स्तनपान के दौरान 5 से 6 बार आहार ले। जैसे की सुबह में दूध, फिर नाश्ता, मध्य सुबह का खाना ( 11 बजे के करीब जूस आदि ), लंच, मध्य दोपहर का खाना, शाम का आहार ( हल्का नाश्ता ), चाय या दूध , डिनर इस तरह से अपने आहार की योजना बनाये। 
  • पारंपरिक तौर पर स्तनपान कराने वाली माताओं को घी और मेवे से बने व्यंजन लड्डू आदि खिलाए जाते हैं लेकिन इनका उपयोग सीमित मात्रा में करें। वैसे तो मेवे काफी स्वास्थ्यकर होते हैं पर चीनी और घी की अधिक मात्रा की वजह से ये व्यंजन अधिक कैलोरीयुक्त हो जाते है। अतः इनका इस्तेमाल कम करें आप चाहे तो मेवों को दलीया, खीर आदि में डाल कर खाएं जिससे कि आप अधिक कैलोरी से बच सकते हैं। 
  • स्तनपान के दौरान आप वैसे तो अपने पसंदीदा खाद्य पदार्थ ले सकते हैं पर कभी कभी देखने में आता है कि कुछ शिशु किसी विशिष्ट आहार सेवन पर अलग प्रक्रिया दिखाते हैं जैसे कि पेट दर्द,  चिड़चिड़ापन, अधिक रोना आदि। इसके पीछे कोई ठोस प्रमाण नही है। कभी-कभी इन प्रतिक्रियाओं की वजह कुछ अलग भी हो सकती है जैसे की नींद पूरी न होना, पेट भरा न होना, स्तनपान के बाद बच्चे को ठीक से डकार न देना या पेट में गैस आदि।  
  • ऐसा माना जाता है कि दूध और दुग्ध उत्पादन की वजह से कई बच्चों में पेट दर्द की शिकायत होती है और माता वो आहार लेना बंद कर दें तो शिशु को राहत भी मिलती है। इसी तरह कुछ अन्य खाद्य पदार्थ है जिस वजह से पेट दर्द हो सकता है जैसे कि बेसन,पत्तेदार सब्जियां ,प्याज,  पत्तागोभी ,  मसालेदार भोजन , राजमा , सोयाबीन।  
  • अगर आपको ऐसा लगता है कि बच्चा कोई आहार को लेकर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया दिखाता है तो कुछ दिन के लिए बंद कर दीजिए। 
  • आहार के साथ-साथ आपको डॉक्टर की सलाह से आयरन, फोलिक एसिड और कैल्शियम की उचित मात्रा लेना जरूरी होता है। कोई भी अलग दवाई लेने से पूर्व डॉक्टर की सलाह अवश्य ले क्योंकि कई दवाइयों का माता के दूध में अवशोषण होता है जिससे शिशु को नुकसान हो सकता है। 
  • हर बार स्तनपान से पूर्व एक ग्लास पानी या अन्य कोई तरल अवश्य लें क्योंकि स्तनपान कराते समय शरीर में ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन निकलता है जिसकी वजह से प्यास लगती है अतः जब भी प्यास लगे पानी पिए। अपने यूरिन के कलर पर ध्यान दें अगर हल्का पीला हो तो समझ लीजिए की आप पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ ले रहे हैं। अगर गहरा पीला हो तो आप के शरीर में तरल पदार्थ की मात्रा कम है अतः लिक्विड की मात्रा बढाये। 
याद रखिए स्तनपान बच्चे की भविष्य की सर्वोत्तम कुंजी होती है। स्तनपान करने वाले बच्चे का बौद्धिक विकास तेजी से होता है। ऐसे बच्चे सुद्रुढ , सक्रिय और होशियार होते हैं इसीलिए स्तनपान के दौरान हमें आहार का चयन उचित और संतुलित मात्रा में करना चाहिए ताकि हम हमारे बच्चे की स्वास्थ्य की नींव मजबूत कर सके। 

मैं यहाँ पर विशेष धन्यवाद देना चाहूंगा सिलवासा के डॉ भावना त्रिवेदीजी का जिन्होंने यह महत्वपूर्ण जानकारी हमें ईमेल द्वारा भेजी है और इसे यहाँ प्रकाशित करने की अनुमति दी हैं। 

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नाक बंद रहने की कई वजह हो सकती हैं। बहुत से लोग तुरंत नाक खोलने के लिए नेसल ड्रॉप्स / Nasal drops का उपयोग करते हैं। कई बार आवश्यकता होने पर डॉक्टर भी कुछ समय के लिए इसका प्रयोग करने की सलाह देते हैं। किन्तु कई लोग इसका बेहतरीन परिणाम देख, बिना अपने डॉक्टर की सलाह के आगे भी इसका उपयोग करते रहते हैं।

लंबे समय तक इन ड्रॉप्स के प्रयोग से अक्सर नाक बंद रहने लगती हैं। बिना डॉक्टर की सलाह लंबे समय तक इन ड्रॉप्स का उपयोग करने से नाक पर घातक दुष्परिणाम होते हैं जिसे वैद्यकीय भाषा में Rhinitis Medico Mentosa कहा जाता हैं।

यह दुष्परिणाम क्या है और इससे कैसे बचे इसकी अधिक जानकारी निचे दी गयी हैं :

nasal-drop-rhinitis-side-effects-in-hindi

नेसल ड्रॉप्स के दुष्परिणाम
Side effects of Nasal drops in Hindi

नाम में डालने के लिए उपयोग में लिए जानेवाले ड्रॉप्स में ऑक्सीमेटाजोलीन या जाइलोमेटाजोलीन तत्व होते है जो शुरू में नाक के अंदर के टिश्यू की सूजन को तुरंत कम कर देते हैं जिससे नाक तुरंत खुल जाती है और आपको बंद नाक की परेशानी से जल्द छुटकारा मिल जाता हैं। ऐसा तुरंत आराम पाकर हर मरीज खुश होता हैं और आगे जरा सी भी नाक बंद की तकलीफ होने पर सबसे पहले ड्राप का ही बिना सलाह इस्तेमाल करना शुरू कर देता हैं।

लंबे समय तक इन ड्रॉप्स का इस्तेमाल करने से नाक के अंदर टिश्यू का लचीलापन कम होने लगता हैं। रक्तसंचार में असामान्यताएं व नाक के अंदर स्तिथ टर्बिनेट्स आकार में बढ़ जाते हैं जो रूकावट पैदा करते हैं, जिससे अक्सर नाक बंद रहने लगती हैं। इस प्रकार नाक पर पड़े उल्टे दुष्प्रभाव को rebound या chemical rhinitis भी कहते हैं।

नेसल ड्राप में रोगी की निर्भरता बढ़ जाती है जबकि इसका असर भी बहुत कम व कुछ समय के लिए ही रहता हैं जिससे इसे बार-बार अधिक मात्रा में उपयोग करना पड़ता हैं। नाक भी बार-बार बंद पड़ता है पर नाक से पानी नहीं आता और छींक भी नहीं आती।

उपचार / Treatment

नाक के ड्राप के दुष्परिणाम निर्माण होने पर निचे दिए हुए उपचार और सावधानी बरतनी चाहिए :
  • इस तरह की तकलीफ निर्माण होने पर रोगी ने ड्रॉप्स का उपयोग पूर्णतः बंद कर देना चाहिए। 
  • रोगी इस पर निर्भर रहने के कारण शुरुआत में कुछ समय के लिए ड्राप की जगह स्टेरॉयड दवा खाने के लिए दी जाती हैं।
  • इन औषधियुक्त ड्राप की जगह सामान्य सलाइन ड्राप का इस्तेमाल करना चाहिए जो सुरक्षित है और जिसकी आदत भी नहीं होती हैं।  
  • भाप का प्रयोग लाभकारी होता हैं। दिन में 3 बार गर्म पानी में विक्स डालकर भाप लेनी चाहिए। सुबह उठने के बाद, दोपहर और रात को सोने से पहले भाप अवश्य लेना चाहिए। 
  • नाक बंद रहने की मूल वजह का निदान कर इलाज करना चाहिए। यदि इसका कारण पोलिप, हड्डी का टेडापन, गाँठ या साइनोसाइटिस है तो उसका डॉक्टर से उपचार कराना चाहिए।      
  • अगर आपको धूल, मिटटी, धुंआ, केमिकल इत्यादि की एलर्जी है तो उनसे बचकर रहे। एलर्जी का उपचार पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे - एलर्जी का उपचार और बचने के उपाय !
  • नाक को बार-बार बंद होने से बचने के लिए आप निचे दिए हुए योग और प्राणायाम कर सकते हैं। योग की विधि जानने के लिए उस योग के नाम पर क्लिक करे:
  1. कपालभाति 
  2. अनुलोम-विलोम 
  3. ताड़ासन 
  4. त्रिकोणासन 
  5. भुजंगासन 
  • बार-बार नाक बंद होने की तकलीफ से बचने के लिए और रोग प्रतिकार शक्ति को बढाकर एलर्जी को कम करने के लिए आप आयुर्वेदिक औषधि जैसे यष्टिमधु, अश्वगंधा, गिलोय सत्व, आमला, शतावरी, मंजिष्ठा, मुलेठी, शंखभस्म इत्यादि का आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से उपयोग कर सकते हैं। पंचकर्म से औषधि युक्त तेल से नस्य करने से भी बेहतरीन परिणाम मिलते हैं। 
बिना डॉक्टर की सलाह से कोई भी दवा एक बार लेने से भी तकलीफ हो सकती है इसलिए ऐसे ड्रॉप्स का अधिक उपयोग न करे। खासकर कई महिलाए छोटे बच्चो में इनका अधिक उपयोग करती है, उन्हें इस बात का खास ख्याल रखना चाहिए। इस लेख का अधिकतर अंश हमें इ.एन.टी स्पेशलिस्ट डॉ मेहुल सेठ ने रायपुर से ईमेल द्वारा भेजा हैं। निरोगिकाया ब्लॉग टीम और अपने सारे पाठकों की तरफ से उनका बहुत-बहुत धन्यवाद !

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आज कल कई कारणों से युवा दम्पति / couples को प्रेगनेंसी प्लानिंग में देरी हो रही हैं। प्रेगनेंसी प्लानिंग में देरी के कारण महिलाओं को गर्भावस्था प्राप्त करने में कई सारी मुश्किलें आ रही हैं। हमें हर हफ्ते ईमेल, Whatsapp या फेसबुक पेज पर हजारों पाठकों का यह सवाल आता है की गर्भावस्था को जल्द कैसे प्राप्त करे ? या How to get Pregnant fast in Hindi ?

कई पाठकों द्वारा इस एक ही सवाल को पूछे जाने से पता चलता है की यह समस्या अब गंभीर होते जा रही है और इस विषय का पूरा ज्ञान भी पाठकों नहीं मिल रहा हैं। आज इस लेख में हम आपको यही जानकारी देने जा रहे है जिससे उन सभी दम्पति को मदद मिलेंगी जिन्हें गर्भावस्था जल्द प्राप्त करना हैं और अपने परिवार को आगे बढ़ाना हैं।

Pregnancy / गर्भावस्था को जल्द कैसे प्राप्त करे इसकी अधिक जानकारी नीचे दी गयी हैं :

how-to-get-pregnant-tips-in-hindi

गर्भावस्था को जल्द कैसे प्राप्त करे ?
How to get Pregnant fast in Hindi

गर्भावस्था को प्राप्त करने के लिए आप को नीचे दी हुई महत्वपूर्ण बातों का ख्याल रखना चाहिए। जैसे की :
  • वैद्यकीय जांच / Medical Examination : गर्भावस्था हर शादी शुदा स्त्री और पुरुष के जीवन का अहम् हिस्सा होता है और इसे प्लान करने से पहले गर्भावस्था में कोई दिक्कत न हो इसलिए स्त्री और पुरुष दोनों ने अपने फॅमिली डॉक्टर के पास जाकर अपना मेडिकल चेकअप कराना चाहिए जिससे कोई मेडिकल प्रॉब्लम होने पर उसे पहले ही ठीक किया जा सके। 
  1. महिलाओं में मधुमेह, थाइरोइड रोग, रक्त की कमी, कम ब्लड प्रेशर और PCOD जैसी समस्या से गर्भावस्था प्राप्त करने में और सुरक्षित गर्भावस्था में कई दिक्कत आती हैं। इनका निदान गर्भावस्था से पहले कर इन्हें नियंत्रित कर आप आगे होने वाले समस्या को रोक सकते हैं। PCOD की जानकारी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे - PCOD कारन, लक्षण और उपचार हिंदी में !
  2. पुरुष और महिला को हेपेटाइटिस, एड्स या अन्य किसी रोग का संक्रमण होने पर उसका निदान प्रेगनेंसी से पहले होना जरुरी होता हैं। 
  3. प्रेग्नेंट होने के पहले से ही महिला ने पौष्टिक आहार लेकर अपना वजन नियंत्रित करना चाहिए और हीमोग्लोबिन लेवल को कम से से कम 10 से ऊपर रखना चाहिए। मोटापा होने पर महिला को गर्भधारण करने में मुश्किलें आती हैं। मोटापे की समस्या को कम करने के उपाय जानने के लिए यह पढ़े - मोटापा कैसे कम करे ?
  4. ऐसी कई दवा है जिन्हें लेने के बाद 3 से 6 महीने तक प्रेगनेंसी प्लान नहीं करना चाहिए वरना होने वाले बच्चे को क्षति पहुच सकती हैं। अगर आप कोई दवा नियमित ले रहे है तो अपने डॉक्टर से प्रेगनेंसी प्लान करने के पहले वह दवा सुरक्षित है की नहीं यह जरुर जान लेना चाहिए। 
  • संबंध कब बनाये / When to have Sex : गर्भावस्था को प्राप्त करने के लिए जरुरी है की महिला और पुरुष तब संबंध (Sex) बनाये जब गर्भावस्था को प्राप्त करने के chance सबसे अधिक होता हैं। 
  1. औसतन महिलाओं का मासिक धर्म / Menstrual Cycle 30 दिन का होता हैं। जिस दिन महिलाओं में योनि भाग से रक्तस्त्राव शुरू होता है उसे अगर प्रथम दिन पकडे तो इस दिन के बाद के 10 वे दिन से लेकर 20 वे दिन तक के समय में प्रेग्नेंट होने के मौके ज्यादा होते हैं। इस अंतराल को ही Ovulation Phase कहते है जब महिलाओं के अंडाशय (Ovary) से अंडा (Egg) बाहर निकलता है और उसी दौरान वह शुक्राणु (Sperm) से मिलने पर महिला प्रेग्नेंट भी हो सकती हैं। 
  2. मासिक धर्म के 10 से लेकर 20 दिन तक के 10 दिन के समय में भी 14 से 18 दिन का समय अधिक महत्वपूर्ण होता हैं। 
  3. पुरुष के शुक्राणु गर्भाशय में 48 से 72 घंटों तक जीवित रह सकते है इसलिए जरुरी है की इन दिनों में एक दिन छोड़कर पति और पत्नी प्रेग्नेंट होने के लिए सम्बन्ध बनाते रहे।  
  • संबंध कैसे बनाये / Sex technique : पति और पत्नी दोनों Ovulation दिनों में यानि मासिक धर्म के 10 वे दिन से 20 वे दिन के समय संबंध बनाना चाहिए और इस समय के तुरंत पहले पहले और तुरंत बाद संबंध नहीं बनाना चाहिए जिससे की शुक्राणु और अंडाशय का स्वास्थ्य सही रहे और वह गर्भ का निर्माण कर सके। 
  1. Ovulation Phase के 4-5 दिन पहले एक बार संबंध बनाना चाहिए जिससे की पुरुष के semen में मृत शुक्राणु जमा न रहे और नए स्वस्थ युवा शुक्राणु की संख्या अधिक रहे।  
  2. प्रेगनेंसी का मौका बढ़ाने के लिए संबंध (Sex) बनाते समय स्त्री ने पुरुष के नीचे रहना चाहिए और संबंध बनाने के बाद में स्त्री ने कुछ समय तक अपने नितम्ब (Hip) के नीचे तकिया या अन्य कोई सामान रख अपने कमर और हिप का हिस्सा 10 से 15 मिनिट तक ऊपर रखना चाहिए जिससे शुक्राणु बाहर न निकल जाये।
  3. सम्बंध बनाने के तुरंत बाद महिला ने कोई भारी काम नहीं करना चाहिए।   
  4. सम्बन्ध बनाते समय किसी तरह के क्रीम, जेल या तेल का उपयोग न करे। 
  • स्वस्थ शुक्राणु / Healthy Sperms : गर्भावस्था को प्राप्त करने के लिए पुरुष के Semen में शुक्राणु की संख्या और उनकी गतिशीलता (Motility) अधिक होना जरुरी होता हैं। शुक्राणु को स्वस्थ बनाये रखने के लिए इन बातों का ख्याल रखे :
  1. शराब से दुरी बनाये रखे। शराब पिने से शरीर में टेस्टेस्टेरोन हॉर्मोन में कमी आती है जिससे शुक्राणु की संख्या कम हो जाती हैं। 
  2. तम्बाखू, धूम्रपान और गुटखा इत्यादि का सेवन न करे। इन पदार्थो के सेवन से शुक्राणु की गतिशीलता कम हो जाती हैं। 
  3. अगर आपका वजन ज्यादा है तो अपना मोटापा कम करे। मोटापे से पीड़ित लोगो में शुक्राणु की संख्या कम पायी जाती हैं। 
  4. समतोल पौष्टिक आहार लेना चाहिए जिसमे Zinc, Folic acid, Calcium और Vitamin C पर्याप्त मात्रा में मिलना चाहिए। 
  5. अंडकोष / Testicles को अधिक तापमान से बचाने के लिए अधिक गर्म पानी से स्नान, सॉना बाथ और अधिक गर्म कपडे / जीन्स न पहने। अधिक तापमान से अंडकोष में शुक्राणु समाप्त हो जाते हैं। 
  6. शुक्राणु की संख्या और स्वास्थ्य बढ़ाने के अन्य उपाय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे - स्वस्थ शुक्राणु की संख्या बढ़ाने के उपाय !
  • अन्य / Others 
  1. समतोल और पौष्टिक आहार लेना चाहिए। हमारे आहार का हमारे DNA और Genes पर भी असर पड़ता है इसलिए जरुरी है की इस समय प्राकृतिक और पौष्टिक आहार लेना चाहिए। अधिक तीखा मसालेदार और फास्टफूड से दुरी बनाकर रखे। 
  2. आहार में दूध, फल और हरी सब्जियों का समावेश करे। 
  3. रोजाना कम से कम 30 मिनिट व्यायाम और योग करे। व्यायाम और योग से शरीर की flexibility बनी रहती है जिससे गर्भावस्था में कोई परेशानी नहीं होती हैं। 
  4. तनाव से दुरी बनाये रखे। हमेशा प्रसन्न रहे। 
  5. सकारात्मक रहे। पॉजिटिव किताबे पढ़े और पॉजिटिव फिल्मे देखे। 
  6. अपने धर्म के अनुरूप धार्मिक किताबे अवश्य पढ़े। 
  7. अगर आपको कोई बीमारी है तो समय-समय पर डॉक्टर को दिखाकर उसे ठीक करे / नियंत्रण में रखे। 
  8. अपने जीवनसाथी को समझे और उसे खुश रखने का प्रयत्न करे। किसी बात पर बहस करने की जगह एक दुसरे की पूरी बात सुनकर किसी नतीजे पर पहुचे। प्रेगनेंसी के लिए दोनों में आपसी समझ भी बेहद जरुरी हैं। 
अगर आपको प्राकृतिक रूप से गर्भावस्था प्राप्त होनी है तो ऊपर दिए हुए उपाय से 6 महीनो के प्रयास में 10 में से 8 दम्पति में गर्भावस्था प्राप्त हो जाती हैं। अगर 6 महीने के प्रयास के बाद भी गर्भावस्था प्राप्त नहीं हो रही है तो आपको स्पेशलिस्ट डॉक्टर से मिलकर जांच और उपचार कराना चाहिए। आप जितना समय बर्बाद करेंगे या जितना अधिक आपकी आयु होंगी उतनी ही ज्यादा मुश्किल आपको प्रेगनेंसी पाने में होंगी। गर्भावस्था में देरी होने पर पुरुष और महिला दोनों की जांच होनी चाहिए। अक्सर पुरुष महिला को इसका दोषी मानते है जो की पूर्णतः गलत हैं।  

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