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किसी भी महिला के गर्भवती / Pregnant होने या पहली बार माँ बनने पर घर वाले, रिश्तेदार, पडौसी और यहाँ तक की मोहल्ले वाले भी उसे तरह-तरह की सलाह देने लगते हैं। लेकिन सही जानकारी के अभाव में कई बार यह सुझाव महिला के लिए परेशानी की सबब भी बन जाते हैं।

प्रेगनेंसी जैसे महत्वपूर्ण अवस्था में महिला को सभी बातों का ख्याल रखना बेहद जरुरी होता हैं। इस दौरान लिए गए किसी गलत फैसले से महिला और गर्भ में पल रहे बच्चे पर प्रतिकूल परिणाम पड़ सकता हैं।

आइए जानते हैं समाज में गर्भावस्था से पहले व डिलीवरी के बाद में जुड़े भ्रम और उनकी सच्चाई के बारे में।

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1. जिन महिलाओं का पेट आगे की ओर बढ़ता है उन्हें लड़का होता हैं !
सच - यह एक बिलकुल गलत धारणा है और इसका लड़का या लड़की होने से कोई लेना देना नहीं हैं। गर्भावस्था में महिला के पेट का आकर बच्चे के विकास पर निर्भर करता हैं। कई बार मोटापे से ग्रसित महिला का पेट भी इस तरह बढ़ जाता हैं।

2. गर्भवती महिला को एक करवट पर नहीं लेटना चाहिए !
सच - गर्भवती महिला को जिस स्तिथि में सोना आरामदायी लगे वह उस स्तिथि / position में लेट सकती हैं। विशेषज्ञों की माने तो बाई करवट / Left lateral position में लेटने से गर्भ को Blood circulation अच्छी तरह से होता है और बच्चे का विकास भी बेहतर होता हैं।

3. Pregnancy में अधिक समय सोनेवाली महिला को लड़की होती हैं !
सच - Pregnancy में महिला के शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं जिससे महिला को जल्द थकान आती है और नींद भी आती हैं। इसका लड़का या लड़की होने से कोई संबंध नहीं हैं।

4. प्रेगनेंसी में दही नहीं खाना चाहिए क्योंकि इससे बच्चे पर सफ़ेद परत जम जाती हैं !
सच - प्रेगनेंसी में जब बच्चा समय से पहले / Premature पैदा होता है तो उस पर इस प्रकार की सफ़ेद परत जमा होती हैं जिसे कुछ लोग दही समझ लेते हैं। गर्भ में पल रहे बच्चे के सुरक्षा के लिए यह परत होती है और जैसा-जैसा बच्चा गर्भ में बड़ा होता हैं यह परत कम हो जाती हैं।

5. डिलीवरी के पहले भरपेट खाकर हॉस्पिटल जाना चाहिए !
सच - प्रसव पीड़ा शुरू होने पर महिला ने भरपेट नहीं खाना चाहिए। ऐसे समय हल्का खाना बेहतर रहता हैं। भर पेट खाने से उलटी होना, खाना अन्ननलिका से ऊपर आकर श्वास नलिका में फंसने का खतरा रहता हैं।

6. नारियल खाने से बच्चा गोरा होता हैं !
सच - प्रेगनेंसी में नारियल खाने से बच्चे का रंग प्रभावित नहीं होता हैं। ऐसे नारियल पौष्टिक होने के कारण आप गर्भवती महिला को जरूर दे सकते हैं।

7. घी खाने से डिलीवरी आसानी से होती हैं !
सच - घी खाने का डिलीवरी से कोई विशेष संबंध नहीं हैं। प्रेगनेंसी में जितना आवश्यक है उतना ही घी खाना चाहिए।

8. डिलीवरी के बाद कम पानी पीना चाहिए !
सच - डिलीवरी के समय महिला का काफी सारा रक्त निकल सकता है जिससे ब्लड प्रेशर कम होने का खतरा भी रहता हैं। डिलीवरी के बाद महिला ने पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए जिससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है, कब्ज नहीं होती हैं और टाकों पर दबाव नहीं आता हैं।

9. नवजात बच्चे को माँ का दूध / स्तनपान एक दिन बाद ही कराना चाहिए !
सच - डिलीवरी के बाद माँ के स्तन से जो पहले पिला गाढ़ा दूध निकलता है उसे Colostrum कहते है। यह दूध बच्चे को अवश्य पिलाना चाहिए। इस दूध में कई सारे पौष्टिक तत्व और बच्चे की रोग प्रतिकार शक्ति बढ़ाने वाले एंटीबाडीज जैसी महत्वपूर्ण तत्व होते है। बच्चे को जन्म के पश्च्यात गाय का दूध या शहद देने की जगह यह दूध पिलाना चाहिए।

10. प्रसव के बाद डेढ़ महीने तक आराम करना चाहिए !
सच - प्रसव के बाद महिला को आराम अवश्य करना चाहिए पर अत्याधिक आराम करने से महिला को पैरो में सूजन, मोटापा, गैस, कब्ज और  पैर की नस में खून का थक्का जम जाना जैसी समस्या निर्माण हो सकती हैं।प्रसव के बाद नियमित सुबह शाम सैर और हल्का व्यायाम करने से यह तकलीफे नहीं होती हैं।  

गर्भावस्था यह महिला के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है और ऐसे समय किसी के बातों में आकर कोई फैसला लेना या भ्रम पालने से अच्छा है की समय-समय पर अपने डॉक्टर से जांच कराये और अपने मन में उठ रहे सभी छोटेबड़े सवालों का सही जवाब प्राप्त करे।

यह जानकारी रायपुर से डॉ प्रीतम कोठारी जी ने ईमेल द्वारा भेजी हैं। निरोगिकाया ब्लॉग और सभी पाठकों की ओर से उनका बहोत-बहोत धन्यवाद !

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माँ का दुध नवजात शिशु के लिए अमृत समान होता है। बच्चे का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का आधार माँ का दूध ही होता है। हेवल एलिस के अनुसार ' बालक के लिए माँ के दूध का महत्व है वह किसी अन्य प्रकार से प्राप्त नही किया जा सकता है। '


माँ के दूध में बच्चे के विकास के लिए जरूरी सारे पोषक तत्व मौजूद होते है, जिससे की बच्चा स्वस्थ और निरोगी रह सके। पहिले 6 महीने तक केवल स्तनपान लेने वाले बच्चा सामान्य बिमारी से तो दूर रहता हे साथ ही उसमे रोगों से लड़ने की शक्ति भी बढ़ती है।


नवजात बच्चों को स्तनपान कराना बेहद जरुरी होता हैं। स्तनपान कैसे कराये, स्तनपान का महत्व और स्तनपान के विविध लाभ संबंधी अधिक जानकारी नीचे दी गयी हैं :

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माँ के दूध के घटक

Contents of Breast Milk in Hindi
 
माँ के 100 ml दूध में नीचे दिए हुए महत्वपूर्ण घटक द्रव्य होते हैं :

  1. 3 से 5 % फैट, 
  2. 0.8 से 0.9 % प्रोटीन्स, 
  3. 6.9  से 7.2 % कार्बोहाइड्रेट्स लैक्टोज के रूप में, 
  4. 0.2 % मिनरल्स, 
  5. एनर्जी 60 से 75 kcal होती हैं। 
  6. महत्वपूर्ण एंटीबॉडीज 

स्तनपान के क्या लाभ हैं ?

Health Benefits of #Breastfeeding for Infants and Mother in Hindi

स्तनपान ना केवल बच्चे के लिए बल्कि माता के लिए भी फायदेमंद होता है। आइये, जानते है स्तनपान के स्वास्थ्यवर्धक लाभ के बारें में :


माता के लिए
स्तनपान कराना बच्चे के साथ साथ माँ के सेहत के लिए भी वरदान होता है।
  • नियमित रूप से स्तनपान कराने से गर्भावस्था में हुए शारीरिक बदलाओं को ठीक करने में मदत मिलती है।
  • स्तनपान प्रसव पीड़ा को भुलाकर अपने बच्चे के दुलार में खोने मे मदत करता है। 
  • माँ का बेटे से रिश्ता गहरा होता है।
  • स्तनपान प्रसवोत्तर खून की कमी को नियंत्रित करता है।
  • स्तनपान के दौरान मासिक चक्र देरी से आता है जिससे स्त्रीबीज जनन शक्ति याने पुनश्च माँ बनने की अवधि बढ़ती है, इसे ही Lactational Amenorrhea कहते है।
  • स्तन कैंसर एवम गर्भाशय और स्तन के कैंसर का खतरा कम होता है।
  • जब तक स्तनपान कराओ वजन भी नियंत्रित रहता है। उचित मात्रा में स्तनपान कराते समय प्रतिदिन करीब 500 कैलोरीज बर्न होती है जिससे की मोटापे का खतरा कम होता है।
  • स्तनपान काफी किफायती होता है। फार्मूला मिल्क से होने वाले खर्चे से राहत मिलती है।  
  • बोटल का दूध बारबार बनाना, बोटल को बारबार धोना, क्लीन रखना आदि झंझटो से मुक्ति मिलती है।
बच्चों के लिए 

बच्चो के लिए स्तनपान के लाभ की जानकारी निचे दी गयी हैं :
  • स्तनपान करने वाले बच्चे फार्मूला मिल्क लेने वाले बच्चों से कहीं अधिक हेल्थी होते है।
  • स्तनपान में बोटल के दूध से होनेवाले पेट के इन्फेक्शन का खतरा साथ ही रोटा वायरस के संक्रमण का खतरा कम होता है। 
  • नियमित रूप से स्तनपान लेने वाले बच्चों में सर्दी कफ, न्यूमोनिया और डायरिया जैसी बीमारी होने का खतरा कम होता है। साथ ही अस्थमा ,फूड एलर्जी,  सिलियाक डिसीज़, टाइप 2 डायबिटीज और लुकेमिया जैसी बीमारियां भी कम मात्रा में होती है।
  • दूध में कैल्शियम होने से बच्चे की हड्डियां मजबूत होने में मदत मिलती है।
  • स्तनपान से कृत्रिम दूध से होने वाले एलर्जी से राहत मिलती है।
बच्चों को स्तनपान कैसे और कब कराये ?
How to breast feed baby in Hindi


बच्चों को स्तनपान कैसे करे इसकी जानकारी नीचे दी गयी हैं :
  • स्तनपान बेबी के जन्म के तुरन्त बाद 10 min में शुरू करे।
  • बच्चों को स्तनपान कराते समय उनके सिर का भाग बाकी शरीर से ऊपर रखना चाहिए। 
  • बच्चे को स्तनपान कराते समय अगर बच्चा सो जाये तो उसके कान को सहलाना चाहिए जिससे वो दुबारा फीडिंग कर सके। 
  • स्तनपान कराने के बाद बच्चे को कंधे पर सीधा ऐसा रखे की पेट का भाग कंधे पर रहे जिससे दूध पीते समय जो हवा पेट में गयी है वह डकार के साथ बाहर निकल सके। 
  • बच्चे को 6 महीने तक सिर्फ और सिर्फ स्तनपान कराये। 
  • 6 महीने तक विटामिन डी के अलावा और कोई भी आहार जैसे की शक्कर, शहद, ग्राईप वाटर , नारियल पानी या कोई दवाई देने की आवश्यकता नहीं होती है।
  • स्तनपान शुरू करने पर प्रथम 3 से 4 दिन तक जो गाढ़ा और कम मात्रा में द्रव निकलता है उसे कॉलेस्ट्रम कहते है, यह एंटीबाडीज, प्रोटीन्स से भरपूर होता है। यह नवजात शिशु को बीमारियो से बचने के लिए प्रतिकारक्षमता बढ़ाता है। 
  • इसमें शूगर की मात्रा कम होती है इसलिए इसकी कम मात्रा भी नवजात शिशु के लिए काफी होती है। इसे बच्चे को अवश्य पिलाये।
  • 3 से 4 दिन के पश्चात जो दूध निकलता है वो मात्रा में अधिक, पतला होता है, उसमे शूगर की मात्रा भी ज्यादा रहती है, क्योंकि अब बच्चे को ज्यादा कैलोरीज और ज्यादा दूध की आवश्यकता होती है ताकि उसका विकास तेजी से हो सके।
  • वैसे तो सामान्य तौर से हर 2 घण्टे में स्तनपान कराये लेकिन 1 मान्यता यह भी है की बेबी जितनी बार और जितना चाहे उतना स्तनपान कराये। कभी कभी यूरिन या पॉटी के वजह से 2 घण्टे के भीतर भी उसे भूक लग सकती है।
  • सामान्यतः दिन में 8 से 12 बार स्तनपान कराये। बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होगा वैसे-वैसे स्तनपान की मात्रा कम होती जाएगी। 
  • एक बार फिर स्तनपान शुरू कर दे तो इसे 1 से 2 वर्ष तक हम बच्चों को दे सकते हैं। 
  • 6 महीने के बाद ऊपर के पौष्टिक आहार के साथ स्तनपान भी देते रहे।
इस तरह स्तनपान नवजात के लिए आदर्श पोषण होता है। यह बच्चे की इम्यून सिस्टम स्ट्रांग करके सुरक्षा कवच की भाँति कार्य करता है।

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स्तन का कर्करोग / Breast Cancer यह महिलाओं में पाए जानेवाला वाला सबसे आम  कैंसर में से एक है। महिलाओं के साथ कुछ पुरुषों में भी स्तन का कर्करोग हो सकता है। विष्वभर भर में स्तन कैंसर के प्रति जागरूकता फ़ैलाने का प्रयास अनेक सरकारी और गैर सरकारी संस्था द्वारा किया जाता है। अगर समय पर इस कैंसर को पहचान कर योग्य उपचार किया जाये तो इसे आसानी से रोक जा सकता हैं।

आज हम इस लेख में ब्रैस्ट / स्तन कैंसर के कारण, लक्षण और निदान संबंधी जानकारी दे रहे हैं। अधिक जानकारी निचे दी गयी हैं :

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स्तन कर्करोग के कारण 

Causes of Breast Cancer in Hindi 

स्तन कैंसर का कोई पुख्ता कारण अभी तक पता नहीं चला हैं। यह आज नहीं पता है की कुछ महिलाओं में यह क्यों होता है तो क्यों कुछ में क्यों नहीं होता हैं। फिर भी, ऐसे कुछ कारण पता चले है जिनसे ब्रैस्ट कैंसर होने की संभावना अधिक हो जाती हैं। इन कारणों की जानकारी निचे दी गयी हैं :
  • आयु / Age : स्तन का कर्करोग अधिक आयु के महिलाओं में ज्यादा पाया जाता हैं। लगभग 80 % स्तन का कर्करोग 45 वर्ष से अधिक आयु के महिलाओं में पाया जाता हैं। 
  • अनुवांशिकता / Hereditary : जिन महिलाओं के निकट के रिश्ते में किसी व्यक्ति को स्तन का कर्करोग होता है उन महिलाओं को यह कर्करोग होने की संभावना अधिक रहती हैं। 
  • गाँठ / Lump : जिन महिलाओं को पहले स्तन में साधारण गाठ या सुजन हो चुकी है उन महिलाओं को आगे जाकर ब्रैस्ट कैंसर होने की कुछ संभावना रहती हैं। 
  • मोटापा / Obesity : रजोनिवृत्ति / Menopause के बाद अगर महिला का वजन सामान्य से अधिक रहता है या BMI 26 से अधिक रहता है तो उनमे कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती हैं। 
  • व्यसन / Habit : जो महिलाए धुम्रपान, तम्बाखू या शराब का सेवन करती है ऐसी महिलाओं को स्तन कर्करोग होने का खतरा अधिक रहता हैं। 
  • हॉर्मोन गोली / HRT : जो महिलाए लम्बे समय तक एस्ट्रोजन-प्रोजेस्टेरोन जैसे हॉर्मोन की गोली लेती है उनमे ब्रैस्ट कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता हैं। 
  • लम्बाई / Height : एक अध्ययन में यह पता चला है की जिन महिलाओं की लम्बाई सामान्य से ज्यादा होती है उनमे स्तन के कर्करोग की संभावना अधिक होती हैं। इसका कोई विशेष कारण पता नहीं चला हैं।
  • विकिरण / Radiation : किसी कारण अधिक C T SCAN या XRAY करने की वजह से भी रेडिएशन के अधिक सम्पर्क में आने से भी ब्रैस्ट कैंसर की संभावना बढ़ जाती हैं। 
ऊपर दिए हुए कारणों के अलावा भी ब्रैस्ट कंस के कुछ कारण है पर यहाँ पर विशेष कारणों की चर्चा ही की गयी हैं।

स्तन के कर्करोग के लक्षण 

Symptoms of Breast Cancer in Hindi 

स्तन के कर्करोग के विशेष लक्षणों की जानकारी निचे दी गयी हैं :
  1. स्तन में गाँठ 
  2. स्तन में बगल में दर्द होना जिसका मासिक से कोई संबंध नहीं हैं 
  3. स्तन के त्वचा का रंग बदलना / लाल होना 
  4. निप्पल के ऊपर या आसपास लाल चकत्ते पड़ना 
  5. बगल में सुजन आना 
  6. स्तन का एक हिस्सा कड़क होना 
  7. निप्पल से द्रव या रक्त निकलना 
  8. निप्पल का आकार बदलना या अन्दर जाना 
  9. स्तन का आकार या रूप बदलना 
  10. स्तन की त्वचा की छाल / परत निकलना     
ऊपर दिए हुए लक्षणों में से कोई भी लक्षण नजर आने पर तुरंत अपने नजदीकी स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास जाकर अपनी जांच करानी चाहिए।

स्तन के कर्करोग का निदान कैसे किया जाता हैं ?

Diagnosis of Breast Cancer in Hindi 

स्तन के कर्करोग के लक्षण नजर आने पर अक्सर महिलाए घबराकर अपने स्त्री रोग डॉक्टर के पास जाकर अपनी जांच कराती हैं। स्तन के कर्करोग का पता लगाने के लिए फिर डॉक्टर निचे दिए हुए जांच कराते हैं :
  1. शारीरिक जांच : डॉक्टर रोगी को विविध सवाल पूछ कर रोगी की सारी परेशानी समझने के बाद स्तन परिक्षण करते हैं। इसमें रोगी को बैठकर या खड़े रखकर दोनों हाथों को बाजु में और ऊपर रखकर दोनों स्तन की जांच की जाती हैं। 
  2. मेम्मोग्राम : रोगी के स्तन की जांच करने के पश्च्यात Mammogram जांच की जाती हैं। इसमें रोगी के स्तन का X Ray निकालकर सुजन या गांठ किस प्रकार की है यह पता लगाया जाता हैं। आजकल 2D और 3D Mammogram भी किया जाता है जिससे अधिक सटीक निर्णय प्राप्त होते हैं।  
  3. सोनोग्राफी : स्तन के गाँठ या सुजन में मास है या कोई द्रव भरा है यह पता लगाने के लिए स्तन का अल्ट्रासाउंड या सोनोग्राफी की जाती हैं। 
  4. बीओप्सी : कर्करोग की आशंका होने पर स्तन के गाँठ का छोटा से टुकड़ा निकालकर (Biopsy) उसका परिक्षण किया जाता हैं। गाँठ सामान्य है या कैंसर है और अगर कैंसर है तो किस प्रकार का है यह पता लगाया जाता हैं। 
  5. स्तन MRI : इस परिक्षण में एक डाई का इंजेक्शन रोगी को देकर MRI परिक्षण किया जाता हैं। कैंसर कहा तक और कितना फैला है यह पता लगाया जाता हैं। 
इस तरह डॉक्टर विविध परिक्षण कर स्तन के कर्करोग का पता लगाते है और उसके प्रकार और तीव्रता अनुसार क्या उपचार किया जाना चाहिए यह तय करते हैं। स्तन के कर्करोग से व्यक्ति को बचाने के लिए बेहद जरुरी है की रोगी का निदान जल्दी हो और उपचार भी जल्द शुरू हो सके। 

स्तन के कर्करोग का उपचार और इस भयानक बीमारी से बचने के विविध उपाय जानने के लिए यहाँ क्लिक करे - ब्रैस्ट कैंसर का उपचार और बचने के उपाय

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विष्वभर में महिलाओं में स्तन का कर्करोग / ब्रैस्ट कैंसर (Breast Cancer) के मामलों में तेजी से इजाफा हो रहा हैं। आधुनिक युग की बिगड़ी जीवनशैली और लापरवाही के चलते इसका खतरा महिलाओं में बढ़ रहा हैं। समय पर जांच और उपचार में देरी होने से कैंसर स्तन से शरीर के अन्य भाग में फैलने से रोगी की स्तिथि गंभीर हो सकती हैं।

यह सच है की ब्रैस्ट कैंसर का रोकथाम पूरी तरह से महिलाओं के हाथ में नहीं हैं फिर भी कुछ विशेष एहतियात बरतकर और मुलभुत जानकारी से परिचित होकर महिलाए इस खतरे की संभावना को कम कर सकती हैं। अगर शुरूआती दौर में ही इस समस्या का निदान हो जाये तो तुरंत उपचार कर इसे फैलने से रोका जा सकता हैं।

Breast Cancer के बचाव और उपचार की जानकारी निचे दी गयी हैं :

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ब्रैस्ट कैंसर से बचने के लिए क्या एहतियात बरतने चाहिए ?

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ब्रैस्ट कैंसर से बचने के लिए क्या सावधानी और एहतियात बरतने चाहिए इसकी जानकारी निचे दी गयी हैं :
  • स्तन परिक्षण / Breast Examination : समय-समय पर अपने स्तन की जांच खुद करे या साल में एक बार किसी अनुभवी महिला रोग विशेषज्ञ से अपनी जांच कराये। अगर स्तन में किसी प्रकार की गाँठ या दर्द का अनुभव होता है तो तुरंत अपने डॉक्टर से मिले। अगर आपके परिवार में माँ, मौसी या अन्य किसी को पहले स्तन कैंसर हुआ है तो यह आपको होने की संभावना भी अधिक रहती है। इसलिए 30 वर्ष के आयु के पश्च्यात हर वर्ष अपने महिला डॉक्टर से जांच कराये और 40 वर्ष के पश्च्यात हर वर्ष मैमोग्राफी भी अवश्य कराये।  
  • गर्भनिरोधक (हॉर्मोन) गोलीया / Hormone Tablets : कुछ महिलाए लम्बे समय तक बिना डॉक्टर की सलाह लिए गर्भनिरोधक या हॉर्मोन रिप्लेसमेंट गोलिया लेते रहती हैं। इन गोलियों का ऐसे इस्तेमाल करने से मोटापा और स्तन कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता हैं। महिलाए ऐसी दवा का अपने डॉक्टर की सलाह से कम उपयोग कर ब्रैस्ट कैंसर के खतरे को कम कर सकती हैं। 
  • स्तनपान / Breastfeeding : आजकल की कामकाजी महिलाए डिलीवरी के बाद बच्चे को केवल 6 महीने ही स्तनपान कराती है। बच्चों को कम से कम 1 वर्ष के आयु तक स्तनपान अवश्य कराना चाहिए। यह बच्चों के स्वास्थ्य के लिए और माँ के स्वास्थ्य के लिए भी बेहद आवश्यक हैं। स्तनपान कराने से महिलाओं में होरमोंस नियंत्रित रहते है और स्तन के कैंसर का खतरा भी कम हो जाता हैं। 
  • गर्भावस्था / Pregnancy : आजकल महिलाओ की शादी देरी से हो रही है और शादी के बाद भी बच्चे के लिए महिलाए देरी से प्लानिंग करती हैं। अधिक उम्र में गर्भवती होने से महिलों में होरमोंस में गड़बड़ी आ जाती है जिससे गर्भपात और कैंसर का खतरा बढ़ जाता हैं। महिलाओं के लिए सही वक्त पर शादी करना और माँ बनना स्वास्थ्य के दृष्टी से बेहद जरुरी हैं। 
  • नशा / Habits : भारत में महिलाओं में सिगरेट, शराब और तम्बाखू जैसे नशीली चीजो के सेवन का प्रमाण ऐसे तो कम है पर कुछ बेहद गरीब और कुछ बेहद अमीर घर की महिलाओ में ऐसे नशे की आदत देखी गयी हैं। ऐसे सभी नशीली चीजों से महिलाओं से दूर रहना बेहद जरुरी हैं। 
  • आहार / Diet : महिलाओं ने समतोल पौष्टिक आहार लेना चाहिए जिससे उन्हें सभी पौष्टिक तत्व पर्याप्त मात्रा में मिले और उनमे मोटापे की समस्या भी निर्माण न हो सके। बाजार में मिलने वाले अधिक तीखे, तले हुए और केमिकल युक्त फास्टफूड का सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसा आहार करने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता हैं। 
  • योग / Yoga : शरीर को स्वस्थ और निरोगी रखने के लिए अनुलोम-विलोम, कपालभाती, सूर्यनमस्कार, पश्चिमोत्तानासन, त्रिकोणासन, मयूरासन जैसे योग रोज करने चाहिए। इनसे शरीर की रोग-प्रतिकार शक्ति बढती है जो की शरीर में हर रोज निर्माण होनेवाले सूक्ष्म कैंसर कारक पेशी का खात्मा कर देते हैं। 

Breast Cancer का उपचार कैसे किया जाता हैं ?

Treatment and Remedies of Breast Cancer in Hindi

स्तन कैंसर होने पर उसकी तीव्रता और प्रकार के अनुसार दवा, रेडियो थेरेपी, कीमोथेरेपी और सर्जरी कर उपचार किया जाता हैं।
  • दवा / Medicine : अगर गाँठ सामान्य है तो डॉक्टर विटामिन इ की दवा देते हैं। मासिक के दौरान भी कुछ गाठे उभरती है जो मासिक के साथ खत्म हो जाती हैं। इसके लिए डॉक्टर प्राइमरोज आयल और विटामिन इ देते हैं। दवा हमेशा डॉक्टर की सलाह से ही लेना चाहिए।  
  • शल्य कर्म / Surgery : आजकल सर्जरी में पुरे स्तन को नहीं हटाया जाता हैं। सर्जरी में केवल स्तन के पीड़ित हिस्से को ही निकाला जाता हैं। सर्जरी कराने के 2 से 3 हफ्ते बाद स्त्री अपने सामान्य जीवन में वापस आ सकती हैं। 
  • विकिरण / Radiation : अब रेडिएशन उपचार भी काफी प्रगत हो चूका हैं। रेडिएशन से अब शरीर में विषैले तत्व कम तैयार होते हैं और ठीक होने में समय भी कम लगता हैं। ब्रैस्ट कैंसर में ऑपरेशन या कीमोथेरेपी के बाद बचे हुए कैंसर के सेल्स का खात्मा करने के लिए रेडिएशन दिया जाता हैं। ऑपरेशन और कीमोथेरेपी के एक महीन बाद रेडिएशन किया जाता हैं। रेडिएशन कुछ मिनटों तक ही दिया जाता है और 3 से लेकर 6 हफ़्तों तक 1 सप्ताह में 2 से 3 बार दिया जाता हैं।  
  • औषधि चिकित्सा / Chemotherapy : अगर कैंसर दुबारा होने की या शरीर में फैलने की संभावना है तो रोगी को किमोथेरेपी दिया जाता हैं। इसमें भी अब काफी सुरक्षित दवा का निर्माण किया जा चूका हैं।किमोथेरेपी से रोगी को ठीक करने में 2 महीने तक का समय लग सकता हैं। इसके बाद रेडिएशन की जरुरत पड़ती है तो 2 महीने और लगते हैं। 
जिस महिला को किमोथेरेपी, रेडिएशन और सर्जरी 3 की जरुरत पड़ती है वह 6 से 9 महीने में ठीक हो सकती हैं।
स्तन कैंसर भी दूसरी बिमारियों की तरह है जिसका इलाज संभव हैं। इसलिए डरने की जरुरत या इलाज से दूर भागकर जादू-टोने का सहारा लेने की जरुरत नहीं हैं।      

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आजकल के आधुनिक युग में लोगों भले ही कई क्षेत्र में बेहद प्रगति की है पर इस प्रगति के चक्कर में लोगों ने अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज किया हैं। आपको समाज में ऐसे कई प्रतिष्ठित लोग मिलेंगे जो बड़े वकील, व्यापारी अफसर या शायद डॉक्टर ही है और जिन्होंने अपने क्षेत्र में बेहद प्रगति है पर आप उमके स्वास्थ्य के तरफ गौर करेंगे तो वो वह मधुमेह, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और एसिडिटी जैसे किसी बीमारी के शिकार होंगे।

नाम और पैसे कमाने के चककर में हम अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ करते है और इसका परिणाम यह होता है की हम उस उच्च परिस्तिथि का अपने ख़राब स्वास्थ्य के कारण पर्याप्त उपभोग भी नहीं कर पाते हैं। आज हम ऐसे ही एक पीड़ादायक स्वास्थ्य समस्या की चर्चा करने जा रहे है जो कमजोर पाचन शक्ति और बिगड़ी जीवनशैली के कारण होती हैं।

गुदा भाग में कब्ज और कड़क मल के कारण चिर / Crack पड़ जाती है और बेहद पीड़ा होती है। इस समस्या को फिशर / Fissure या गुदचिर कहा जाता हैं। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति न तो ठीक से बैठ पाता है और नाहि आहार ले पाता हैं। फिशर का आधुनिक और आयुर्वेदिक उपचार, घरेलु नुस्खे और इससे बचने के उपाय की जानकारी निचे दी गयी हैं :

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फिशर के कारण और लक्षण की जानकारी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे - Causes and symptoms of Fissure in Hindi.

फिशर का उपचार कैसे किया जाता हैं ?
Treatment and Ayurveda Home Remedies of Fissure in Hindi

फिशर का उपचार, फिशर की तीव्रता पर निर्भर करता हैं। शुरूआती दौर में ही इसे औषधि और गुद भाग में लगाये जानेवाले मलम / क्रीम देकर ठीक किया जा सकता हैं। अगर पीड़ा अधिक है और रक्तस्त्राव भी अधिक हो रहा है तो शल्य कर्म / Surgery कर इसे ठीक किया जाता हैं। 
  • कब्ज / Constipation : बवासीर हो या फिशर, सबसे पहले रोगी की कब्ज की शिकायत को दूर करना बेहद जरुरी होता हैं। कब्ज को ठीक करने के लिए गोली, सिरप, फाइबर युक्त दवा, मल को मुलायम करने वाली दवा दे सकते हैं। अगर आपको कब्ज की समस्या है तो कब्ज से राहत पाने की सम्पूर्ण जानकारी पढने के लिए यहाँ क्लिक करे - कब्ज से राहत पाने के उपाय और घरेलु नुस्खे ! 
  • दवा / Medicine : कब्ज को ठीक करने के लिए दी जानेवाली दवा के साथ डॉक्टर आपको अन्य दवा देते है। जैसे की :
  1. दर्द नाशक दवा - Analgesic, Anesthetic
  2. सुजन कम करने वाली दवा - Anti-inflammatory
  3. एसिडिटी की दवा - Antacids 
  4. इन्फेक्शन रोकने के लिए दवा - Antibiotics
  5. रक्तस्त्राव रोकने की दवा - Bleeding Control drugs
  6. इंजेक्शन - Botox Injection 
  • शल्य कर्म / Surgery : औषधि उपचार से सफलता न मिलने पर ऑपरेशन कर फिशर का उपचार किया जाता हैं। 
  1. Anal Sphincterotomy - इसमें गुद भाग के संकोचक पेशी को हल्का सा काटकर ढीला किया जाता है जिससे फिशर जल्दी से ठीक होने में सहायता होती हैं। 
  2. Fissurectomy - अगर फिशर की जगह अधिक सख्त है और इसे ठीक होने में मुश्किल लगती है तो इसे ऑपरेशन कर काट दिया जाता है। नयी जख्म को दवा और ड्रेसिंग कर ठीक किया जाता हैं। 
  • आयुर्वेदिक उपचार / Ayurveda : बवासीर और फिशर जैसी समस्या का आयुर्वेदिक औषधि का उपयोग कर सफल उपचार किया जा सकता हैं। 
  1. औषधि / Medicine : त्रिफला चूर्ण, हरीतकी चूर्ण, आरोग्यवर्धनी वटी, अभयारिष्ठ, चित्रकादी वटी, पंचकोलासव, हिन्गावाष्ठक चूर्ण जैसी आयुर्वेदिक औषधि देकर रोगी के पाचन संबंधी विकार को दूर किया जाता है और फिशर की समस्या को ठीक किया जाता हैं। गुद भाग में लगाने हेतु जात्यादी तेल और कासिसादी तेल का उपयोग किया जाता हैं। 
  2. क्षारसुत्र : अगर रोगी को सेंटिनल पाइल्स की समस्या है तो औषधि युक्त धागा / क्षारसूत्र उसे बांधकर 5 से 6 दिन तक रखा जाता हैं। 5 से 6 दिन बाद यह सेंटिनल पाइल्स अपने आप काटकर गिर जाता हैं। इसमें कोई दर्द या ब्लीडिंग नहीं होती हैं। क्षारसूत्र चिकित्सा से फिशर में 2 हफ्ते में ठीक हो जाता हैं। 
  3. अग्निकर्म : इस विधि में औषधि संस्कार किये हुए विशेस अग्नि कर्म यंत्र से सेंटिनल पाइल्स या फिशर को अग्नि / heat से काट दिया जाता हैं। इसमें रोगी को हल्का दर्द होता हैं।   
  • योग / Yoga : बवासीर और फिशर से जुडी समस्या से राहत लाने के लिए आप योग का सहारा भी ले सकते हैं। योग और प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से पाचन शक्ति अच्छी रहती हैं, कब्ज नहीं होती, आपकी रोग प्रतिकार शक्ति बढ़ती है और जखम के भरने की गति बढ़ती हैं। फिशर में आप निचे दिए हुए योग कर सकते हैं। योग की सम्पूर्ण विधि पढ़ने के लिए उस योग के नाम के ऊपर केवल क्लिक करे :
  1. अनुलोम-विलोम 
  2. कपालभाति 
  3. वज्रासन 
  4. धनुरासन 
  5. पवनमुक्तासन 
  6. त्रिकोणासन 
  • घरेलु नुस्खे / Home Remedies : फिशर से निजात पाने के लिए आप निचे दिए हुए घरेलु नुस्खे भी अपना सकते हैं। ऐसे तो यह सभी नुस्खे सुरक्षित है पर फिर भी एहतियात के तौर पर इन्हे अपनाने के लिए अपने डॉक्टर की राय अवश्य लेना चाहिए। 
  1. एलोवेरा का गुदा / Gel को फिशर पर साफ कर दिन में दो बार लगाने से जल्द राहत मिलती हैं। 
  2. जैतून का तेल में शहद मिलाकर हल्का गर्म कर गुदा भाग में लगाने से दर्द कम होता है और घाव सूखने में मदद मिलती हैं। 
  3. नारियल तेल को दिन में 2 बार गुदा में लगाने से मलत्याग आसानी से होता है और फिशर ठीक होने में आसानी होती हैं। 
  4. अलसी में प्रचुर मात्रा में फाइबर होता है। इसे अपने आहार में शामिल करे। इसका 1 चमच्च पाउडर रोजाना 1 ग्लास गुनगुने पानी के साथ लेने से काफी लाभ मिलता हैं। 
  5. किसी कड़क जगह पर बैठने की जगह मुलायम या तकिया रखकर उस पर बैठे। लम्बे समय तक बैठा काम काम नहीं करना चाहिए।   
  6. हफ्ते में कम से कम 2 दिन सुरन की सब्जी अवश्य खाना चाहिए। इससे फिशर ठीक होने में बेहद मदद होती हैं। 
  7. हफ्ते में कम से कम दो बार मख्खन खाने से भी खुनी बवासीर और फिशर में राहत मिलती हैं। 

फिशर से बचने के लिए क्या करे ?
How To Prevent Fissure in Hindi 

फिशर से बचने के लिए निचे दिए हुए एहतियात का पालन करना चाहिए :
  1. आहार / Diet : फिशर से बचने के लिए आपको अपने आहार पर विशेष ध्यान देना बेहद आवश्यक हैं। आपको फ़ास्ट फ़ूड से दुरी बनकर रखना चाहिए। आहार में हरी सब्जियां, फल और फाइबर युक्त साबुत अनाज का अधिक सेवन करना चाहिए। भोजन के साथ सलाद अवश्य लेना चाहिए। भोजन में अधिक तीखा, तलाहुआ और मसालेदार पदार्थो का समावेश न करे।  
  2. पानी / Water : पानी कम पिने से मल काफी कड़क हो जाता है और गुदा भाग ड्राई रहता है जिस कारण गुदा भाग में चिर पड़ने की संभावना बढ़ जाती हैं। आपको मौसम के हिसाब से पर्याप्त मात्रा में पानी पिते रहना चाहिए। एक दिनभर में कम से कम 8 ग्लास या 2.5 से 3 लीटर पानी अवश्य पीना चाहिए। 
  3. व्यायाम / Exercise : आपको हफ्ते में कम से कम 5 दिन रोजाना 30 मिनिट तक अपने क्षमता के अनुसार व्यायाम अवश्य करना चाहिए। लगातार लम्बे समय तक बैठे रहने से बवासीर और फिशर होने का खतरा बढ़ जाता हैं। आपको दिन में हर एक घंटे बैठे रहने के बाद कम से कम 5 से 10 मिनट खड़ा होकर टहलना चाहिए और एक्टिव रहना चाहिए। इससे न तो कब्ज होंगी और ह्रदय के स्वास्थ्य के लिए भी यह उपयोगी हैं। 
  4. नशा / Habit : अगर आपको चाय / कॉफ़ी / शराब / तम्बाखू / धूम्रपान / गुठखा या मावा का नशा है तो इसे जल्द बंद करे। यह आपके पाचन शक्ति को कमजोर करता है और कब्ज को बढ़ावा देता हैं।  
  5. सिकाई / Sitz Bath : अगर आपको कब्ज रहती है और आपको लगता है की आपको बवासीर या फिशर की समस्या निर्माण हो रही है तो आपने दिन में 2 से 3 बार गुद भाग की सिकाई / Sitz Bath करना चाहिए। एक टब में हल्का गर्म पानी भरकर उसमे दिन में 2 से 3 बार 10 से 15 मिनिट बैठकर गुद भाग को सकने से लाभ मिलता हैं। इससे गुद भाग को आराम मिलता हैं, गुद भाग में रक्त प्रवाह अच्छे से होता हैं और बवासीर / फिशर की समस्या निर्माण नहीं होती हैं।  
इस तरह एहतियात बरतकर आप फिशर जैसे कष्टदायी रोग से खुद को बचा सकते हैं। याद रहे - पहला सुख निरोगिकाया ! अगर आपका शरीर और मन स्वस्थ है तो ही आप एक खुशहाल स्वस्थ जिंदगी जी सकते हैं !
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आजकल लोगों की बिगड़ी हुई जीवनशैली के कारण पाचन से जुड़े विकार तेजी से बढ़ रहे हैं। कहते है की पेट सभी बिमारियों की जड़ है और अगर आपका पाचन कमजोर है तो आपको कब्ज, बवासीर, फिशर और एसिडिटी जैसी तकलीफों का सामना करना पड़ता हैं। आज हम इस लेख में कमजोर पाचन शक्ति और मिथ्या आहार-विहार कारण होनेवाले एक ऐसे ही पीड़ादायक रोग की जानकारी दे रहे हैं।

आमतौर पर गुदा / Anus से जुडी सभी स्वास्थ्य समस्या को बवासीर या Piles ही समझा जाता हैं। मलत्याग करने में पीड़ा होना और मल के साथ रक्त आने की स्तिथि को अकसर बवासीर ही समझा जाता हैं। कई रोगी ऐसी हर तकलीफ को बवासीर मानकर मेडिकल से दवा लेकर अपना ईलाज खुद करना शुरू कर देते हैं। ऐसा ही एक रोग है फिशर या Fissure-in-ano जिसे आयुर्वेद में परिकर्तिका या गुदचिर भी कहा जाता हैं। फिशर रोग में गुद भाग में एक चिर पड़ जाती है।

फिशर का कारण और लक्षण की जानकारी निचे दी गयी हैं :

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फिशर / गुदचिर के क्या कारण हैं ?
Causes of Fissure in Hindi

फिशर होने का सबसे प्रमुख कारण है कब्ज होना। अगर रोगी को कब्ज है या मल सामान्य से अधिक कड़ा (hard) हो गया है तो रोगी को मल त्याग करने के लिए अधिक जोर लगाना पड़ता है जिस कारण मलत्याग होते समय कड़क मल के कारण गुदा भाग में चिर / crack पड जाती हैं। एक बार ऐसी चिर पड़ जाने पर आगे से मलत्याग करते समय असहनीय पीड़ा होती है और चिर में से रक्तस्त्राव / bleeding भी होता हैं।

निचे दिए हुए व्यक्तिओ को फिशर होने की संभावना अधिक होती हैं :
  • जिन लोगो को हमेशा कब्ज की शिकायत रहती हैं,
  • अधिक फ़ास्ट फ़ूड सेवन करते हैं 
  • पानी कम पिते हैं
  • कोई व्यायाम नहीं करते है 
  • हमेशा बैठा काम अधिक करते हैं 
  • गर्भावस्था 
  • मोटापा 
  • शराब का अधिक सेवन   
  • HIV, TB और गुद भाग के कर्क रोग के रोगी 

फिशर के लक्षण क्या हैं ?
Symptoms of Fissure in Hindi ?

फिशर के लक्षणों की जानकारी निचे दी गयी हैं :
  1. चिर / Crack : फिशर का निदान करने के लिए यह महत्वपूर्ण लक्षण हैं। बवासीर में जहां गुदा भाग में सूजन होती है वही बवासीर में गुदा भाग में चिर होती हैं। 
  2. दर्द / Pain : फिशर के रोगी को मलत्याग करते समय असहनीय पीड़ा होती हैं। अगर समय पर उपचार न करे तो यह दर्द मलत्याग करने के बाद भी दिनभर रह सकता हैं। दर्द के साथ रोगी को गुदा भाग में जलन और खुजली भी हो सकती हैं। 
  3. रक्तस्त्राव / Bleeding : फिशर के कई रोगियों में मलत्याग करते समय रक्तस्त्राव भी होता हैं। यह रक्तस्त्राव मल पर रक्त की लकीर या फिर रक्त की बूंदों के समान हो सकता हैं। यह रक्त हमेशा ताजा लाल रक्त होता हैं। 
  4. पेशाब / Urine : फिशर से पीड़ित रोगी को पेशाब करने में समस्या होती है और बार-बार पेशाब के लिए जाना पड़ता हैं। 
  5. बादी बवासीर / Sentinel Piles : अगर फिशर की समस्या पुरानी है और इसका समय पर उपचार नहीं किया है तो गुदा भाग में दोनों तरह सूजन आ जाती है जिसकी वजह से वह हिस्सा बवासीर की तरह लटकने लगता हैं। इसे बादी बवासीर / Sentinel Piles कहते हैं। 
कई लोग फिशर को बवासीर मानकर अपना इलाज खुद ही करना शुरू कर देते हैं। अगर आपको ऊपर दिए हुए लक्षण नजर तो तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाकर समय पर इसका उपचार कारण चाहिए। फिशर का उपचार, घरेलु नुस्खे और बचने के उपाय जानने के लिए यहाँ क्लिक करे - फिशर का आयुर्वेदिक उपचार और घरेलु नुस्खे।

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