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आजकल हेल्दी रहने के लिए भूरे चावल (छिलकेवाला चावल) यानि की Brown Rice खाने का ट्रेंड बढ़ रहा है। सफ़ेद और भूरे चावल में से कौन सा ज्यादा फायदेमंद है इसे लेकर असमंजस बना हुआ है। डायबिटीज के रोगियों के लिए कौन सा राइस बेहतर है या डायबिटीज के रोगी ब्राउन राइस खा सकते हैं या नहीं यह सवाल हमेशा बना रहता है। 

डायबिटीज के रोगियों का मुख्य लक्ष्य अपने रक्त में शुगर की मात्रा को नियंत्रण में रखना होता हैं। अगर डायबिटीज के रोगी अपने आहार में विशेष डाइट का पालन करते है तो उन्हें अधिक दवा लेने की जरुरत नहीं पड़ती हैं। खाने-पिने में थोडीसी लापरवाही भी डायबिटीज के रोगियों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं। 

आज इस लेख में हम आपको डायबिटीज के रोगी भूरे चावल यानि ब्राउन राइस खा सकते है की नहीं इस सवाल का जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं। डायबिटीज के रोगी ब्राउन राइस खा सकते हैं या नहीं इसकी जानकारी नीचे दी गई है :
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क्या डायबिटीज के रोगी ब्राउन राइस खा सकते है ?

Brown Rice Health benefits in Diabetes in Hindi

डायबिटीज के रोगियों को अपने ब्लड शुगर लेवल को कण्ट्रोल में रखने के लिए आहार में कार्बोहाइड्रेट्स का सेवन अधिक नहीं करना चाहिए। ब्राउन राइस और वाइट राइस में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा समान होती हैं पर ब्राउन राइस में अन्य पौष्टिक गुण होने की वजह से डायबिटीज रोगी इसे सेवन कर सकते हैं। भूरे चावल का सेवन कितना करना है यह हर डायबिटीज के रोगी के लिए अलग-अलग हो सकता है क्योंकि हर रोगी का शुगर कण्ट्रोल अलग-अलग होता हैं। 

अगर आपका शुगर कण्ट्रोल अच्छा है तो आप हफ्ते में दो से तीन बार भूरे चावल खा सकते हैं वही अगर आपका शुगर लेवल अधिक रहता है तो आप हफ्ते में एक बार ही इसका सेवन कर सकते हैं। आपको भूरे चावल का सेवन कितना करना चाहिए इसकी सलाह आपको अपने डॉक्टर या आहार विशेषज्ञ से ही लेनी चाहिए। 

भूरे चावल क्यों है बेहतर ? Health Benefits of Brown Rice in Hindi

  • फाइबर : ब्राउन राइस में फाइबर ज्यादा होने की वजह से यह कम खाया जाता है और इसीलिए कार्बोहाइड्रेट का इंटेक भी कम होता है। ब्राउन राइस में फाइबर की मात्रा ज्यादा होने से इसे हाई फाइबर फूड श्रेणी में रखा जाता है। 
  • वजन कम करता हैं : यह वजन कम करने में मददगार है। इसमें फाइबर अधिक होने से व्यक्ति अधिक खाने की आदत से बच सकता हैं। 
  • स्वास्थ्यकर : इसे खाने से हृदय रोग, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और स्ट्रोक का खतरा घटता है। 
  • पौष्टिक : ब्राउन राइस में फास्फोरस, विटामिन B काम्प्लेक्स, मैग्नीशियम की मात्रा ज्यादा है। इसमें एंटीआक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में होने से यह हेल्थ के लिए फायदेमंद है। 
  • कम Glycemic Index : सफ़ेद चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स 72 है और ब्राउन राइस का ग्लाइसेमिक इंडेक्स केवल 50 है इसलिए इसे खाने से अधिक शुगर नहीं बढ़ती हैं। 
  • एंजाइम : भूरे चावल में 300 तरह के विविध पाचक एंजाइम पाए जाते है तो इन्सुलिन की मात्रा को बढ़ाते है और शुगर लेवल में कमी लाते हैं। 
  • कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट्स : ब्राउन राइस में कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट्स होते है जो की Slow releasing Carbohydrates है। इसकी वजह से इसे खाने से तुरंत शुगर नहीं बढ़ती हैं। 
  • पेट का कैंसर : ब्राउन राइस में फाइबर और सेलेनियम अधिक प्रमाण में होता है जिससे पेट का कैंसर होने का खतरा कम हो जाता हैं। 
  • स्तन कैंसर : अमेरिका में हुए संशोधन में पाया गया है की ब्राउन राइस का नियमित सेवन करने से महिलाओं में इंट्रोलेक्टोन तत्व की मात्रा बढ़ जाती है जिससे स्तन का कैंसर होने का खतरा कम हो जाता हैं। 
  • पौष्टिक तत्व : भूरे चावल को खाने के लिए तैयार करते वक्त सिर्फ बाहरी परत हटाई जाती है जिससे न्यूट्रिशंस का नुकसान कम होता है। सफ़ेद चावल बनाते समय कई परत हटाई जाती है जिससे पौष्टिक तत्व निकल जाते हैं। सफ़ेद चावल में कम फाइबर और स्टार्च अधिक होता है। 
इस तरह भूरे चावल या Brown Rice, सफ़ेद चावल की तुलना में अधिक पौष्टिक, पाचक और स्वास्थ्यकर हैं। ब्राउन राइस का केवल एक बात का दोष है की इसक स्वाद सफ़ेद चावल जितना स्वादिष्ट नहीं होता है पर एक बार इसे आप खाना चालू कर दे तो फिर आपको यह भी उतना ही स्वादिष्ट लगने लगेगा। 

आशा है आपको यह भूरे चावल की जानकारी उपयोगी लगी होगी और इसे आप शेयर अवश्य करेंगे। 

सनस्क्रीन त्वचा को सूरज की नुकसानदेह किरणों से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सूरज की हानिकारक किरणें न सिर्फ आपकी त्वचा को टैन करती है बल्कि समय से पहले आप की स्किन भी मुरझाने लगती है। सनस्क्रीन ना केवल धूप में बल्कि घर मे भी और हर मौसम में 12 ही महीने प्रयोग करना चाहिए।सनस्क्रीन के नियमित इस्तेमाल से न सिर्फ धूप से त्वचा की रक्षा होती है, बल्कि त्वचा पर होने वाले उम्र के संकेत जैसे झाइयां, झुर्रियां आदि को भी लंबे समय तक रोका जा सकता है। 

ज्यादातर सनस्क्रीन UVA किरणों से सुरक्षा देता है पर हमें वह सनस्क्रीन का प्रयोग करना चाहिये , जो UVA व UVB दोनों से सुरक्षा दे अर्थात वह ब्रॉड स्पेक्ट्रम हो जैसे avobenzone, octocryelin, titanium dioxide, zinc oxide आदि। आज इस लेख में हम आपको सनस्क्रीन के फायदे, लगाने का तरीका और कौनसा सनस्क्रीन आपके लिए बेहतर है इसकी जानकारी देने जा रहे हैं। 

Sunscreen से जुडी उपयोगी जानकारी निचे दी गयी हैं :

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कौन सा सनस्क्रीन है आपके लिए बेहतर ? 

Tips to choose sunscreen Lotion in Hindi

सनस्क्रीन लगाने के क्या फायदे हैं ? Benefits of Sunscreen in Hindi

आइये, जानते है सनस्क्रीन के फायदे :
  • सनस्क्रीन, सनबर्न के लक्षणों से व सूरज की हानिकारक किरणों से त्वचा को बचाता है।
  • सनस्क्रीन के प्रयोग से टैनिंग की समस्या से बचा जा सकता है। साथ ही फोटोएजिंग, झाइयां आदि से भी लंबे समय तक राहत मिलती है।
  • सनस्क्रीन के नियमित प्रयोग से त्वचा के कैंसर की आशंका कम होती है। 
  • कुछ दवाइयों ( जैसे टेट्रासाइक्लिन, सल्फा ड्रग्स आदि )के सेवन से सनबर्न जैसे लक्षण दिखते हैं, सनस्क्रीन के उपयोग से इन लक्षणों में कमी आती है। 

सनस्क्रीन कैसे काम करता हैं ?

  • सनस्क्रीन में मौजूद घटक द्रव्य सूरज की हानिकारक किरणों को सोख लेते है या उन किरणों का प्रतिकार करके उन्हें त्वचा के भीतरी सतह तक पहुचने से रोकते हैं। 
  • सनस्क्रीन को लगाने का यह मतलब कतई नहीं है कि आप धूप में लंबे समय तक खड़े रह सकते हैं क्योंकि सनस्क्रीन हर तरह के किरणों से त्वचा की रक्षा करने में सक्षम नहीं होता है। 
  • सनस्क्रीन बाज़ार में कई रूप मौजूद होता है , जैसे क्रीम, लोशन, जेल, लिप् बाम आदि। हमे हमारी त्वचा के अनुकूल सनस्क्रीन का प्रयोग डॉक्टर या सौंदर्य विशेषज्ञ के परामर्श से करना चाहिए। 

सनस्क्रीन लगाने का समय व तरीका How to apply Sunscreen in Hindi

  • हमारे पूरे शरीर को करीब 30 gm (1 औंस) सनस्क्रीन कवर कर सकता है। हमे जिस जगह सनस्क्रीन लगाना है, वहाँ पर डॉट डॉट लगाकर 1 से 2 उंगलियों से हल्के हाथों से मसाज करना या थपथपाना चाहिए। 
  • सामान्यत: हमें सनस्क्रीन दिन में दो से तीन बार हर 3 घंटे में लगाना चाहिए। अगर हमें बाहर जाना हो तो धूप में निकलने के 20 से 30 min पहले सनस्क्रीन लगाना चाहिए। 
  • अगर आपके सनस्क्रीन में टाइटेनियम डाइऑक्साइड या जिंक ऑक्साइड है तो आप इसे लगाकर तुरन्त बाहर जा सकते है। 
  • अगर हम लंबे समय तक बाहर धूप में रहते हो तो हर 2 घंटे में सनस्क्रीन लगाना चाहिए। सनस्क्रीन लगाने से पूर्व चेहरे को अच्छी तरह साफ करें।
  • स्विमिंग करने के बाद, पसीना आने के बाद, या अगर वेट टिश्यू या टॉवल से मुंह पोंछा हो तो सनस्क्रीन  फिर से लगाना चाहिए।
  • शरीर का जो भी भाग खुला रहता है, वहाँ पर सनस्क्रीन जरूर लगाएं। इस बात का ध्यान जरूर रखे कि चेहरे या शरीर के अन्य भाग पर सनस्क्रीन लगाते वक्त वह सब जगह बराबर मात्रा में लगे। 
  • अगर आप सनस्क्रीन युक्त लिप बाम का प्रयोग करते हो तो इसे सिर्फ लिप एरिया पर लगाये। 
  • सनस्क्रीन का प्रयोग करते वक्त ध्यान रखे, की वह आंखों में न जाएं। अगर ऐसा हो , तो आँखों को पानी से धो ले। 
  • छोटी उम्र के बच्चों में सनस्क्रीन ना लगाएं। उनकी त्वचा प्राकृतिक रूप से सूरज की किरणों से रक्षा करने वाली होती है, लेकिन ध्यान रखें कि छोटे बच्चों को फुल स्लीव्स के कपड़े और कैप पहना कर ही बाहर भेजें।


कौन सा सनस्क्रीन है बेहतर ? How to choose Sunscreen lotion in Hindi

आपके लिए कौन सा सनस्क्रीन बेहतर है इसका चुनाव करने के लिए निचे दी हुई बातों पर निर्भर करता हैं।  जैसे की :

SPF - Sun Protection Factor

सनस्क्रीन का चुनाव करते वक्त सबसे ज्यादा जरूरी है SPF की सही मात्रा। डर्मेटोलॉजिस्ट के अनुसार हमे कम से कम 15 SPF वाला सनस्क्रीन जरूर लगाना चाहिए, यह करीब 93% तक सूरज की किरणों से रक्षा करता है। SPF करीब 97% व SPF 50 करीब 98% तक हानिकारक किरणों से बचाव करता है।  
गर्मी, प्रदूषण, व त्वचा के जरूरत के अनुसार हमे सनस्क्रीन का उचित चयन करना चाहिए। अगर आपको ज्यादा देर धूप में नहीं रहना है तो आप कम SPF वाली सनस्क्रीन का प्रयोग भी कर सकते हैं।

UVA व UVB

ध्यान रखे, की सनस्क्रीन का चुनाव करते वक्त UVA व UVB दोनों से सुरक्षा देनेवाला सनस्क्रीन इस्तेमाल करे।
UVA किरणों से त्वचा में रंजकता व फ़ोटोएजिंग की समस्या होती है, जब कि UVB किरणों से त्वचा के कालेपन व कैंसर की संभावना होती है। UVA से बचने के लिए PA++ व UVB से बचाव के लिए SPF जरूर देखें।

वाटरप्रुफ और वाटर रेझिस्टंट सनस्क्रीन

बाजार में वाटरप्रूफ व वाटर रेजिस्टेंट दोनों प्रकार के सनस्क्रीन मौजूद होते हैं। कहा जाता है कि,वाटरप्रूफ सनस्क्रीन का असर पानी में करीब 80 मिनट रहता है, जबकि वाटर रेजिस्टेंट सनस्क्रीन का असर पानी में करीब 40 मिनट तक रहता है। पर एक्सपर्ट इसमें सच्चाई नहीं मानते हैं, उनके अनुसार अगर आप को पसीना आता है या आप पानी में जाते हो तो सनस्क्रीन का असर उतना प्रभावी नहीं रहता है। आप अपनी जरुरत के हिसाब से सनस्क्रीन का चयन कर सकते हैं। 

सनस्क्रीन व सनब्लॉक 

सनस्क्रीन और सनब्लॉक में यह फर्क है, की सनस्क्रीन UVB किरणों को कम मात्रा में फ़िल्टर करता है बल्कि 
सनब्लॉक दोनों प्रकार के किरणों से सुरक्षा देता है।

त्वचा प्रकारनुसार सनस्क्रीन का चयन
  • हमें हमारी त्वचा के हिसाब से सनस्क्रीन का चयन करना चाहिए। अगर आपकी त्वचा तैलीय है, तो आप स्प्रे या जेल बेस्ड सनस्क्रीन का प्रयोग करें। इससे आपकी त्वचा ऑयली नहीं लगेगी। आप चाहे तो ऊपर से पाउडर या कॉम्पैक्ट लगा सकते है। 
  • अगर आपकी स्किन ड्राई या रूखी है तो आप मॉस्चराइजर क्रीम युक्त सनस्क्रीन का प्रयोग करें। 
  • अगर सनस्क्रीन लगाने के बाद आपके त्वचा की चमक चली जाती है तो आप मैट फिनिश वाले सनस्क्रीन का उपयोग कर सकते हैं। इससे आपकी त्वचा पर ताजगी बनी रहेगी। 
  • अगर आपकी त्वचा बहुत ज्यादा तैलीय है या आपको अधिक पसीना आता है तो आप सनस्क्रीन में लैक्टो कैलामाइन लोशन भी मिलाकर लगा सकते हैं।
  • अगर आपकी त्वचा सांवली है तो मायक्रोनाईज्ड सनस्क्रीन का इस्तेमाल करे। 
फीजिकल सनस्क्रीन हैं बेहतर 

मार्केट में दो तरह के सनस्क्रीन होते हैं, फिजिकल व  केमिकल। फिजिकल सनस्क्रीन में SPF अधिकतम 20 तक होता है। 20 से ऊपर SPF वाले सनस्क्रीन में केमिकल की मात्रा बढ़ती जाती है। ध्यान रखें कि कि, फिजिकल सनस्क्रीन केमिकल सनस्क्रीन की तुलना में बेहतर होता है क्योंकि इसमें केमिकल की मात्रा कम रहती है। 

मॉइस्चराइजर भी है जरूरी

SPF के साथ त्वचा को नमी बनाए रखने के लिए मॉइस्चराइजर की भी जरूरत होती है। आप चाहे तो मॉइस्चराइजर युक्त सनस्क्रीन का उपयोग कर सकती है या सनस्क्रीन के करीब 20 min पहले मॉइस्चराइजर लगा सकती है। सनस्क्रीन जितनी नई होगी , उसका प्रभाव भी उतना ही बेहतर होगा। 
ध्यान रखे, की सनस्क्रीन में Oxybenzone न हो। यह त्वचा के लिए हानिकारक होता है, इससे एलर्जी भी हो सकती है।

सनस्क्रीन के नुकसान Sunscreen Side effects in Hindi

सामान्यतः सनस्क्रीन त्वचा के लिए सुरक्षित होता है। सनस्क्रीन के प्रयोग से बहोत कम लोगों में एलर्जिक रिऐक्शन जैसे खुजली, रेडनेस आदि होते है। अगर कुछ ऐसा हो तो तुरंत सनस्क्रीन का प्रयोग बंद करे व डॉक्टर से सम्पर्क करें और अन्य घटक वाला सनस्क्रीन यूज़ करे। 
कई बार कपड़ों में मौजूद कुछ घटक जैसे एमिनो बेन्जोइक एसिड या PABA आदि के वजहों से कपड़ों पर स्टैन ( दाग) हो सकता है।

सनस्क्रीन का इस्तेमाल करते समय इन बातों का रखे ध्यान 

  • सनस्क्रीन के इस्तेमाल के पूर्व उसके साथ दी हुई सारी जानकारी अवश्य पढ़ें।
  • मैन्युफैक्चर और एक्सपायर तिथि जरूर चेक करें। 
  • अच्छे ब्रांड का सनस्क्रीन इस्तेमाल करें।
  • क्रीम बेस सनस्क्रीन का प्रयोग करें। स्प्रे व पाउडर युक्त सनस्क्रीन खनिज बेस्ड होते है। अतः इनके इस्तेमाल से बचे। 
  • पूर्ण रूप से सुरक्षा के लिए SPF 30 या इससे अधिकवाला सनस्क्रीन चुने।
  • सनस्क्रीन में मौजूद घटक द्रव्य को अच्छी तरह से पढ़े। जिंक ऑक्साइड, टिटेनियम डाइऑक्साइड है या नही। ये सन प्रोटेक्शन के लिए आवश्यक होते है। हालांकि इनके कुछ साइड इफ़ेक्ट भी होते है।
  • अधिक समय तक बाहर रहना हो, तो पसीना रोकने वाली क्रीम का प्रयोग करें।
  • बच्चों के लिए सनस्क्रीन खरीदते वक्त ध्यान रखे कि इसमें परामिनोबेंज़ोइक एसिड व बेंज़ोफेनोन्स जैसे घटक न हो।
  • यदि आपकी त्वचा ऑयली,मुहांसो वाली है तो वाटर बेस्ड सनस्क्रीन का प्रयोग करे। 
  • बाजार में कई तरह के हर्बल सनस्क्रीन भी उपलब्ध होते हैं, जिनमें केमिकल की मात्रा कम या नहीं होती है। आप चाहे तो वह भी इस्तेमाल कर सकते हैं। 
  • अगर आप घर के अंदर रहते हो फिर भी आपको सनस्क्रीन का इस्तेमाल जरुर करना चाहिए।

धूप से बचाव के लिए कुछ अन्य महत्वपूर्ण टिप्स

  1. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर आहार को अपनी रोजाना की दिनचर्या बनाये, जैसे निम्बू, आंवला, सन्तरा, मोसम्बी, सलाद, हरि सब्जियां आदि। ये आपकी त्वचा का पोषण कर अंदरूनी सनस्क्रीन की तरह त्वचा को डैमेज से बचाएंगे। 
  2. सनस्क्रीन के पूर्व त्वचा पर नारियल तेल या एलोवेरा जेल लगाए, ताकि सनस्क्रीन और अधिक प्रभावी हो व त्वचा को नेचुरल पोषण भी मिले। 
  3. धूप में बाहर जाने के पूर्व छाता, सनग्लासेस, स्कार्फ़ का प्रयोग जरूर करे।
  4. पूरे दिन में 10 से 15 ग्लास पानी अवश्य पिये। 
  5. ध्यान रहे, की सुबह की कोमल धूप में विटामिन डी होता है, जो शरीर व हड्डियों के विकास के लिए जरुरी होता है। इस वक्त धूप में 10 से 15 min खड़े रहे व सनस्क्रीन ना लगाएं। 
इस तरह कालेपन, सूरज की हानिकारक किरणों व सनबर्न से बचने के लिए डर्मेटोलॉजिस्ट की सलाह से उचित सनस्क्रीन का प्रयोग कर अपनी त्वचा की रक्षा करें।
अगर यह Sunscreen in Hindi का लेख आपको उपयोगी लगता है तो कृपया इसे शेयर अवश्य करे। 

जब Kidney Failure के कारण रोगी की दोनों किडनी काम करना बंद कर देती है तब रोगी को डायलिसिस / Dialysis की जरुरत पड़ती हैं। किडनी हमारे शरीर में रक्त शुद्धिकरण का कार्य करती हैं और उसके ख़राब हो जाने पर रोगी के शरीर में विषैले तत्वों की संख्या बढ़ जाती है जिसके कारण रोगी की मृत्यु भी हो सकती हैं।

जब रोगी की दोनों किडनी काम करना बंद कर देती है तब किडनी के कार्य को मशीन की सहयता से कृत्रिम रूप से करने की विधि को डायलिसिस कहते हैं। किडनी डायलिसिस के कारण रोगी की दोनों किडनी पूरी तरह से ख़राब हो जाने पर भी लम्बे समय तक जिन्दा रखा जा सकता हैं। 

किडनी डायलिसिस क्या है, इसके प्रकार क्या है और यह कैसे किया जाता है इसकी जानकारी इस लेख में निचे दी गयी हैं :

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किडनी डायलिसिस क्या हैं ? What is Kidney Dialysis in Hindi

डायलिसिस क्या है और इसकी जरुरत कब पड़ती हैं ?

What is Dialysis in Hindi

जैसे की हमने ऊपर पढ़ा हैं, जब रोगी की दोनों किडनी काम करना बंद कर देती है तब किडनी के कार्य को मशीन की सहयता से कृत्रिम रूप से करने की विधि को डायलिसिस कहते हैं। जब रोगी के किडनी की कार्यक्षमता 90% तक कम हो जाती हैं और शरीर में क्रिएटिनिन और यूरिया जैसे विषैले तत्व की मात्रा बढ़ने लगती है तब डायलिसिस की जरुरत पड़ती हैं। 

डायलिसिस मशीन क्या कार्य करता हैं ?

डायलिसिस मशीन लगभग वही कार्य करती है जो किडनी हमारे शरीर में करती हैं। जैसे की :
  1. रक्त में बढे हुए विषैले तत्व जैसे की क्रिएटिनिन, यूरिया आदि को बाहर निकालकर रक्त की शुद्धि करना।
  2. शरीर में पानी का प्रमाण नियंत्रित करना। 
  3. रक्त में सोडियम, पोटैशियम, क्लोराइड, मैग्नीशियम आदि इलेक्ट्रोलाइट की मात्रा नियंत्रित करना। 
  4. रक्त में एसिड की मात्रा को नियंत्रित करना। 
क्रोनिक किडनी फेलियर (CRF) के रोगियों को डायलिसिस की आवश्यकता बार-बार पड़ती हैं। रोगी की किडनी कैसे कार्य कर रही हैं और रोगी कैसा आहार ले रहा है इस पर डायलिसिस की कितनी आवश्यकता पड़ती है निर्भर करता हैं। 

किडनी डायलिसिस के कितने प्रकार हैं ? Dialysis types in Hindi

किडनी डायलिसिस के प्रमुख दो प्रकार हैं :
  1. Haemodialysis / हिमोडायलिसिस - इस प्रकार के डायलिसिस में Haemodialysis मशीन और एक विशेष प्रकार के क्षारयुक्त द्रव्य की सहायता से रक्त की शुद्धि की जाती हैं। यह प्रक्रिया कम खर्चीली होने के कारण इसका उपयोग ज्यादा होता हैं। 
  2. Peritoneal Dialysis / पेरिटोनियल डायलिसिस - इस प्रकार के डायलिसिस में पेट में एक खास प्रकार की नली जिसे P D Catheter कहते है, उसे डालकर एक विशेष क्षार युक्त द्रव्य डालकर रक्त की शुद्धि की जाती हैं। 
हिमोडायलिसिस में कृत्रिम किडनी की कृत्रिम झिल्ली और पेरिटोनियल डायलिसिस में पेट की पेरिटोनियम झिल्ली semipermeable membrane की तरह काम करती है जिसमे से शरीर के लिए अनावश्यक विषैले तत्वों तो निकल सकते है पर शरीर के लिए जरुरी तत्व जैसे रक्त कण नहीं निकल पाते हैं। झिल्ली की एक तरफ डायलिसिस का द्रव्य होता है तो दूसरी तरफ रक्त होता हैं। 

हिमोडायलिसिस कैसे किया जाता हैं ? Haemodialysis in Hindi

  • हिमोडायलिसिस प्रक्रिया हॉस्पिटल में या तो डायलिसिस सेंटर से डॉक्टर और नर्स के देखरेख में किया जाता हैं। 
  • हिमोडायलिसिस मशीन में पंप की सहायता से रोगी का 250 से 300 ml रक्त हर मिनिट कृत्रिम किडनी में शुद्धिकरण के लिए भेजा जाता हैं। 
  • खून का थक्का न बने इसलिए हिपारिन दवा का उपयोग किया जाता हैं। 
  • रोगी के शरीर में दो नली (IV line) लगायी जाती है जिसमे में से एक से खून मशीन में जाता है और दूसरे नली से शुद्ध रक्त रोगी के शरीर में पहुंचाया जाता हैं। 
  • हिमोडायलिसिस में रक्त शरीर से बाहर निकलने के लिए डबल ल्यूमेन कैथिटर, ए वी फिस्टुला या ग्राफ्ट विधि का उपयोग किया जाता हैं। 
  • खून शुद्ध होने के बाद फिर से शरीर में पहुंचाया जाता हैं। 
  • हिमोडायलिसिस की प्रक्रिया 3 से 4 घंटे तक चलती है जिसमे लगभग 12 बार रक्त की शुद्धि होती हैं। 
  • रोगी को सामन्यतः हफ्ते में 3 बार इसकी जरुरत पड़ती हैं। 
  • यह काफी आसान प्रक्रिया है और इसमें रोगी किताब, अखबार पढ़ सकता है, टीवी देख सकता हैं। 
  • हिमोडायलिसिस करने से पहले रोगी का वजन देख जाता है ताकि पिछले बार से कितना वजन बढ़ा है और शरीर में पानी जमा हुआ है इसका अंदाजा लग सके। 
  • खून की कमी होने पर रोगी को खून चढ़ाना पढ़ सकता हैं। 
  • रोगी को प्रक्रिया समझने पर रोगी घर पर भी होम हिमोडायलिसिस मशीन से यह विधि कर सकता हैं। 

पेरिटोनियल डायलिसिस कैसे किया जाता हैं ? Peritoneal Dialysis in Hindi

पेरिटोनियल डायलिसिस में पेट में एक खास प्रकार की नली जिसे P D Catheter कहते है, उसे डालकर एक विशेष क्षार युक्त द्रव्य डालकर रक्त की शुद्धि की जाती हैं। हमारे पेट के अंदर सभी अंगो को जकड़कर रखने वाली एक झिल्ली / membrane होती है जिसे Peritoneum कहते हैं। यह झिल्ली चलनी / semipermeable होती हैं। 

पेरिटोनियल डायलिसिस के प्रकार 
  1. Intermittent Peritoneal Dialysis - यह पेरिटोनियल डायलिसिस की प्रक्रिया 36 घंटो तक चलती हैं और हर 3 से 5 दिनों में इसे दोहराना पड़ता हैं। 
  2. Continuous Ambulatory Peritoneal Dialysis - यह पेरिटोनियल डायलिसिस विकसित देशों में किया जाता है जिसमे रोगी घर पर स्वयं बिना मशीन के पेरिटोनियल डायलिसिस कर सकता हैं। 
  3. Continuous Cyclic Peritoneal Dialysis - इस पेरिटोनियल डायलिसिस में स्वचालित साईकलर मशीन का उपयोग किया जाता हैं। यह इलाज कुल 8 से 10 घण्टे का होता हैं। इस दौरान रोगी नियमित गतिविधि कर सकता हैं। 

डायलिसिस का दुष्परिणाम क्या हैं ? Dialysis side effects  in Hindi

  • डायलिसिस की सुविधा हर जगह उपलब्ध न होने के कारण बार-बार बड़े शहर में जाने का खर्चा उठाना पड़ता हैं। 
  • स्वच्छता का पालन न करने पर संक्रमण फैलने का डर रहता हैं। 
  • खाने में विशेष परहेज रखना पड़ता हैं। 
  • रोगी को हर बार सुई का दर्द उठाना पड़ सकता हैं। 
  • डायलिसिस यूनिट चालू करना बेहद खर्चीला हैं। 
  • डायलिसिस का मतलब यही नहीं होता है की आपकी किडनी ठीक हो जाएगी। इसमें सिर्फ आप के खून की सफाई होती है और बार-बार इस प्रक्रिया की जरुरत पड़ती हैं। 

रोगी को कौन सा डायलिसिस करना चाहिए ? Best Dialysis in Hindi

रोगी के लिए कौन सा डायलिसिस प्रक्रिया योग्य है इसका चयन रोगी की शारीरिक और आर्थिक स्तिथि देखकर केवल डॉक्टर ही तय कर सकते हैं। दोनों डायलिसिस प्रक्रिया का फायदे और नुकसान होते है पर जो विधि रोगी के लिए बेहतर है उसकी जानकारी रोगी को दी जाती हैं। 

डायलिसिस की प्रक्रिया सफल होने के लिए रोगी का अनुशासित होना बेहद जरुरी होता हैं। समय पर डायलिसिस करना और आहार विशेषज्ञ की सलाह से खाने में परहेज का पालन करना आवश्यक होता हैं। इस लेख में हमने डायलिसिस की संक्षिप्त जानकारी दी हैं। अधिक जानकारी आप अपने डॉक्टर से ले सकते हैं। 

अगर आपको यह किडनी डायलिसिस का लेख उपयोगी लगता है तो कृपया इसे शेयर अवश्य करे। 

गुर्दे जिसे अंग्रेजी में Kidney (किडनी) कहते हैं, हमारे शरीर का एक बेहद महत्वूर्ण अवयव हैं। सामान्यतः हमारे शरीर में दो किडनी होती है पर किसी-किसी को जन्मतः एक किडनी भी होती हैं। शरीर में एक स्वस्थ किडनी होने पर भी इंसान लम्बे समय तक जिन्दा रह सकता हैं।

किडनी हमारे शरीर में रक्त की सफाई का कार्य करती है और रक्त में मौजूद जहरीले तत्वों को शरीर से बाहर निकालती हैं। किडनी शरीर में पानी, सोडियम, कैल्शियम और पोटैशियम की मात्रा को नियंत्रित करती हैं। शरीर में एसिड एवं क्षार का नियंत्रण करती हैं।

शरीर में जब किडनी अपना रक्त शुद्धिकरण का कार्य ठीक से नहीं कर पाती है तब शरीर में विषैले तत्व का प्रमाण बढ़ने लगता हैं, इसी स्तिथि को Kidney Failure या गुर्दे की खराबी कहा जाता हैं। किडनी फेलियर क्या है, इसके लक्षण, प्रकार और निदान से जुडी सम्पूर्ण जानकारी निचे दी गयी हैं :

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गुर्दे की खराबी के लक्षण, प्रकार और निदान 

Kidney Failure symptoms, types and diagnosis in Hindi

गुर्दे की खराबी किसे कहते हैं ? Kidney Failure in Hindi

  • जब किडनी की कार्यक्षमता किसी कारणवश कम हो जाती है और रक्त में Serum Creatinine और Blood Urea की मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है तब उस स्तिथि को Kidney Failure कहा जाता हैं। 
  • किडनी की कार्यक्षमता शरीर से अधिक होती है और किडनी में हलकी खराबी आने पर इसका पता रक्त जांच में नहीं चलता हैं। जब किडनी में 50 % से अधिक खराबी आती है तब ही Serum Creatinine और Blood Urea जांच से इसका पता चलता हैं। 
  • एक किडनी ख़राब होने से या किसी कारणवश एक किडनी निकाल देने से Kidney Failure नहीं होता है क्योंकि ऐसे में शरीर की दूसरी किडनी अपनी कार्यक्षमता बढाकर कार्य करती हैं। 

Kidney Failure के लक्षण क्या हैं ? Kidney Failure symptoms in Hindi

Kidney Failure के मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं :
  1. भूक की कमी 
  2. जी मचलाना 
  3. चेहरे पर सूजन 
  4. हाई ब्लड प्रेशर 
  5. खून / हीमोग्लोबिन की कमी 
  6. पीठ के निचले हिस्से में दर्द 
  7. पैर के निचले हिस्से में सूजन 
  8. शरीर में दर्द 
  9. खुजली 
  10. बार-बार पेशाब में संक्रमण, जलन होना 
  11. पेशाब करने में कठिनाई होना 
  12. याददाश्त में कमी 

किडनी के खराबी के प्रकार क्या हैं ? Kidney Failure types in Hindi 

Kidney Failure के मुख्य दो प्रकार हैं :
  1. Acute Kidney Failure
  2. Chronic Kidney Failure

Acute Kidney Failure in Hindi 

Acute Kidney Failure को Acute Renal Failure या ARF भी कहा जाता हैं। इसमें किसी अन्य रोग के दुष्परिणाम के कारण दोनों किडनी कुछ समय के लिए काम करना बंद कर देती हैं। उस रोग की चिकित्सा करने पर दोनों किडनी फिर से पहले की तरह सुचारु रूप से कार्य कर देना शुरू कर देती है और फिर कोई विशेष दवा या परहेज की जरुरत नहीं पड़ती हैं। बेहद कम मरीजों को Acute Kidney Failure में कुछ समय के लिए डायलिसिस की जरुरत पड़ती हैं। 

Chronic Kidney Failure in Hindi 

Chronic Kidney Failure को Chronic Kidney Disease (CKD) या Chronic Renal Failure (CRF) भी कहा जाता हैं। Chronic Kidney Failure में दोनों किडनियों की कार्यक्षमता किसी अन्य रोगों के कारण महीनो और वर्षों में धीरे-धीरे कम होने लगती है और अंत में दोनों किडनी पूर्ण रूप से काम करना बंद कर देती हैं। फ़िलहाल आधुनिक चिकित्सा पद्धति में Chronic Kidney Failure को ठीक करने का कोई उपचार उपलब्ध नहीं हैं। 

Chronic Kidney Failure में रोगी का उपचार औषधि, खाने-पिने में परहेज, नियमित परिक्षण द्वारा किया जाता हैं। चिकित्सा का उद्देश्य शरीर में Creatinine की मात्रा को नियंत्रित करना, डायलिसिस और किडनी प्रत्यारोपण को टालना होता हैं। Chronic Kidney Failure में स्तिथि गंभीर होने पर रोगी को डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण कराना पड़ता हैं। Chronic Kidney Failure में आयुर्वेदिक औषधि और परहेज का पालन कर रोगी को वर्षों तक जीवित रखा जा सकता हैं।

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किडनी की खराबी का निदान कैसे किया जाता हैं ? Kidney Failure diagnosis in Hindi 

रोगी में Kidney Failure के लक्षण पाए जाने पर डॉक्टर Kidney Failure का निदान करने के लिए निचे दी हुई जांच करते हैं :
  • खून में क्रिएटिनिन और यूरिया की मात्रा : एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति के रक्त में Creatinine की मात्रा 0.6 mg/dl से 1.2 mg/dl तक और Serum Urea के मात्रा 15 से 40 mg/dl रहती है। इससे अधिक रिपोर्ट आने पर किडनी की खराबी का पता चलता हैं। 
  • खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा : शरीर में खून की कमी किडनी फेलियर का संकेत हो सकती हैं। किडनी में खराबी आने से एरीथ्रोपोएटिन हॉर्मोन कम निर्माण होता है जिससे हीमोग्लोबिन में कमी आती हैं। 
  • पेशाब की जांच : बार-बार पेशाब में pus cells का आना और पेशाब में protein / albumin का positive आना किडनी की खराबी को दर्शाता हैं। पेशाब में प्रोटीन अन्य कारणों से भी आ सकता है पर रोगी में अन्य लक्षण के साथ पेशाब में प्रोटीन आना बीमारी बढ़ने का संकेत होता हैं। 
  • सोनोग्राफी : किडनी की सोनोग्राफी कर डॉक्टर किडनी की खराबी का कारण पता कर सकते हैं। आमतौर पर Kidney Failure में किडनी का आकार कम होने लगता है और cortico-medullary differentiation ख़राब हो जाता हैं। सोनोग्राफी से पथरी, पेशाब के रस्ते में अवरोध, किडनी में cyst आदि का पता भी चल जाता हैं। 
  • अन्य जांच : ऊपर दिए हुए जांच के आलावा डॉक्टर कई सारे जांच करा सकते है जैसे की :
  1. CT Scan 
  2. MRI 
  3. Electrolytes 
  4. Lipid Profile 
  5. Creatinine Clearance Test आदि 
इस लेख में हमने Kidney Failure क्या हैं, इसके लक्षण, प्रकार और निदान से जुडी जानकारी संक्षिप्त में दी हैं। Kidney Failure से जुड़े और भी उपयोगी लेख हम जल्द ही इस वेबसाइट पर प्रकशित करेंगे। 
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